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शुक्रवार, 19 जून 2015

कश्ती में चलने वाले समंदर का किनारा भी है

कश्ती में चलने वाले समंदर का किनारा भी है
है फजां धुंंधलाई हुई पर मंजिल तुम्हारा भी है

रात है तो क्या हुआ सब उंघे नही हैं
खामोशियों में बजता दिलों का एकतारा भी है

गिर जाओ फिसल के तो हयात खत्म नही होती
यहां आदमी गिर-गिरकर सम्भलता दोबारा भी है

तारिकियों में ख्वाब होते है जवान यारों
अंधेरों में रोज फलक पे चमकता सितारा भी है

कुछ पल की खानाबदोशी चलो गंवारा सही
वो अर्श पर बैठा हुआ देता गुजारा भी है

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