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सोमवार, 15 जून 2015

झोपड़ी से होती हुई महलों तक गई

झोपड़ी से होती हुई महलों तक गई
हौसलों की टोलियां थी मंजिलों तक गई


लाख गर्दिशें आती रही मझदार में तो क्या
कस्ती आखिर एक दिन शाहिलों तक गई

आधी रात को तनहाइयों में गीत जो उठ गई 
शाम को वो मुस्कराने महफिलों तक गई 


सब बैठे थे कत्ल के बदख्वाह में 
होश खो बैठे जब वो कातिलों तक गई 

न जाने वो कौन सी चीज थी बेखबर सी 
आँखों के रास्ते होकर दिलों तक गई

रात में जो दिख गया एक लौ टिमटिमाता सा
निगाहें उसी की चाह में मिलों तक गई

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