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सोमवार, 22 जून 2015

मेरी अज्ञात राहेंं


अपना कोई पथ नहीं
और न हो कोई लक्ष्य
सखा की भी आवश्यकता नहीं
अकेले अग्रसर होते जाना है
बेधड़क अभय होकर
परन्तु किधर
कुछ भी ज्ञात नहीं मुझे
टेढ़े मेढ़े गली कूचों से होकर जाएं
कांटों या कांच के टुकड़ों से होकर गुजरना पड़े
या फिर अथाह नीर भरे
समन्दर को
लांघने का साहसपूर्ण करजब दिखाना पड़े
या आंधियों से भी टकरा जाना पड़े
समग्र कठिनाइयों से युद्ध करेंगे
और चुनौतियों स्वीकार करते जाएंगे
हमें निंदको ओर ईष्र्यालुओं के कटुवचनों से भी
तनिक भयभीत न होना है
न ही इस जग क अंधे नियमों कानूनों
तथा कुरीतियों से
हम निश्पक्षता व निःसंकोचता के मद्देनजर
यह स्पष्ट कर देते हैं कि
हमारे विचार तथा विचारों का उद्देश्य
किसी को कष्ट देने का नहीं है
न ही किसी नियम का अमर्यादित रूप से
उल्लंघन करने का है
परन्तु हमारी इतनी आकांक्षा जरूर है कि
हम अपने कार्यकलापों के द्वारा
किसी को हानि या कष्ट नहीं पहुंचाते
तो हमारे भी जीवन के स्वच्छ मार्गों में
अड़चन न खड़ा किया जाए
हमें अड़चनें नितान्त अशोभनीय है
हमें अपने उसूलों पे बढ़ते ही जाना है
परन्तु चलते चलते ठहरना किधर है
निश्चित है या कदाचित ठहराव ही नहीं है
सिर्फ इतना हवास है कि
निष्ठा के साथ समुचित जीवन को
इस यात्रा के चरणों में अर्पण कर देना है
तथा अपने त्याग और तप से सेवा का योग
देते देते नश्वर देह को त्याग देना है
यही मेरी उपलब्धि होगी और कत्र्तव्य भी होगा
क्यों न आदमी एकाग्रचित होकर
लक्ष्य को सब स्वीेकार कर
इसके लिए अपना सर्वस्व दाव पर लगा दे
क्योंकि सुना है और पढ़ा भी
कि स्वयं को विसार कर किसी कार्य के लिए
तन्मयता के साथ समर्पण भाव हो
मनचाहा परिणाम प्रदान करता है
यूं तो हमारी सोच है
लक्ष्य ऐसा चिह्नित करो कि
जीवन समाप्त हो जाए भले
पथ यात्रा न समाप्त हो ।

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