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शनिवार, 12 सितंबर 2015

विदुर जब हस्तिनापुर से जा रहे थे तो उनके रूप में कुरुवंश का पुण्य जा रहा था। साक्षात धर्म जा रहा था। धर्म विहीन हस्तिनापुर को तो फिर हारना था

दो फूल सत्संग से 

प्रवृत्ति पुनरावृत्ति है जबकि निवृत्ति लौटकर फिर नहीं आना है। भगवान से अनुराग होने पर संसार से निवृत्ति हो जाती है। संसार हमारे भीतर है इसीलिए बाहर दिखाई दे रहा है। ये हमारा मन ही संसार है ये मन अ -मन हो जाए तो संसार अदृश्य हो जाए। भीतर (हमारे हृदय गह्वर में )युगल सरकार (श्रीजी और श्रीकृष्ण बोले तो श्रीराधाकृष्ण )बैठ जाएं तो संसार आप से आप छूट जाएगा। कहीं घरबार छोड़के जाना नहीं पड़ेगा। घर बैठे ही ये काम हो जाएगा। 

कथा श्रवण ही संसार कर्म से छूटने का उपाय है। जीवन में भजन और कीर्तन होगा तो संसार छोड़ना मजबूरी हो जाएगा। और संसार का छूटना सौभाग्य। मैं और मेरा का मायावी विभ्रम टूट जाएगा। तमाम भ्रांत धारणाएं मैं और मेरा की गिर जाएँगी। 

एक बार उद्धव जी ने  मैत्रेय जी से ये सवाल पूछा था -मनुष्य सुख प्राप्ति के लिए हरेक कर्म करता है लेकिन प्राप्त दुःख ही होता है। इसका कारण क्या है ?

मैत्रेय बोले देह और गेह। घर संसार से ममत्व (ये मेरा है ),आसक्ति ही संसार कर्मबंधन का कारण है। इससे छूटने का उपाय है कथा (कथा बोले तो कृष्ण कथा सन्दर्भ श्रीमद भागवद पुराण से है ). 

महात्मा विदुर हस्तिनापुर छोड़कर तीर्थाटन को नहीं जाते हैं तमाम तीर्थों को तीर्थत्व प्रदान करने जाते हैं। महाभारत युद्ध में धर्म दोनों ओर था महात्मा विदुर के रूप में  कौरव पक्ष की ओर से तथा युधिष्ठिर के रूप में पांडवों की ओर से। दोनों धर्मराज के अवतार थे। फिर भी युद्ध में कौरव हारे तो इसका कारण यह था दुर्योधन ने भक्त अपराध किया था। महात्मा विदुर को अपमानित करके अपने राज्य हस्तिनापुर से निकाल दिया था।

ये दुर्योधन पुत्र के रूप में साक्षात पाप है इसका त्याग कर दो वरना सारा कुरुवंश नष्ट हो जाएगा - बड़े भाई धृतराष्ट्र के पूछने पर कि क्या युद्ध को टालने का कोई उपाय ही नहीं है यही कहा था विदुरजी ने ।

दुर्योधन ने दोनों के बीच का यह वार्तालाप सुन लिया था और आपे से बाहर होते हुए कहा  ये दासी पुत्र यहां क्या कर रहा है  ,इसे कहो हस्तिनापुर छोड़के अपने आप चला जाए वरना ये काम मुझे खुद  करवाना पड़ेगा। 

अन्यत्र भगवान कृष्ण कहते हैं यदि भक्त अपराध मेरी अपनी बाजू भी करे तो मैं उसे भी काटके फैंक दूंगा। भगवान सब कुछ सहन कर सकते हैं भक्त अपराध नहीं।रावण के विनाश का कारण रावण द्वारा राम भक्त विभीषण का अपमान करना था ,तथा हिरण्यकशिपु के विनाश का कारण भक्त प्रह्लाद को यातना देना था। 

विदुर जब हस्तिनापुर से जा रहे थे तो उनके रूप में कुरुवंश  का पुण्य जा रहा था। साक्षात धर्म जा रहा था। धर्म विहीन हस्तिनापुर को तो फिर हारना  था। कर्ण भी इसीलिए मारा गया उसने द्यूत  क्रीड़ा में पांडवों द्वारा सब कुछ हार जाने के बाद कुरुसभा में द्रुपद सुता कृष्णा द्रौपदी को अपशब्द कहे थे -ये पांच पांच पतियों वाली वैश्या है एक वैश्या का क्या सम्मान  होता है  कर दो निर्वसन इसे। 

महात्मा विदुर भी कृष्ण भक्त थे और भक्त अपराध कृष्ण बर्दाश्त नहीं कर पाते। 

(ज़ारी )

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