मित्रों!

आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।


समर्थक

रविवार, 6 सितंबर 2015

गुरु को कीजे बंदगी ,कोटि कोटि परनाम , कीट न जाने भृंग को ,गुरु कर ले आप समान।

GREATNESS OF GURU

गुरु को कीजे बंदगी ,कोटि कोटि परनाम ,

कीट न जाने भृंग को ,गुरु कर ले आप समान। 

पारस पत्थर लौह को तो स्वर्ण में बदल सकता है लेकिन एक पारस  पत्थर दूसरा पारस पथ्थर नहीं बना सकता ,गुरु ये काम करता है। अपना ही क्लोन बना देता है। 

जय श्रीकृष्ण !


1          guru ko kije bandagi, koti koti paranam;
            kit na jane bhring ko, guru karle ap saman.


Meaning

Offer salutations and obeisances to the Guru millions of times.
Just as a wasp takes a worm into its nest and another wasp emerges, just so Guru makes the ordinary disciple as himself.


Commentary

One has to offer obeisances to the Guru who takes the disciple on the path to God, and helps him in every way even though the disciple does not know it. The Guru imparts wisdom to him and makes him as knowledgeable as himself.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें