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गुरुवार, 24 सितंबर 2015

अंतःस्पर्श






ये जो मासूम बच्ची छटपटा रही है

मर रही है कोख में

केवल इसलिए कि -

इस ईश्वर प्रदत्त अनमोल कृपा को

माता पिता अब समझने लगे है अभिशाप

बेटी जनना आजकल लगता है घोर पाप

एक असहनीय बोझ हो गई है बेटी

औ उसके शादी का दहेज।



ये जो नारी लूट रही है

कोने कोने में

गाॅव गाॅव मे

गली गली में

शहर में

कस्बों में

चैराहों पर

सड़कों पर सरे समाज के बीच

तार तार कर रहें हैं अस्मत

आदमी के वेश में कुछ वहसी जानवर।



ये जो खेत में बहा रहा है पसीना

जिसका कफ से जकड़ा है सीना

जिसे सरकार परिभाषित करती है दीना

जी तोड़ परिश्रम के बाद भी

इसे नहीं मिलती है रोटी

अतः विवश होकर

एक दिन कर लेता है खुदखुशी ।



ये जो विलख रहा है

आहत होकर भेदभाव से

लोग स्पर्श नहीं करते

क्योकि वह दलीत है

कुछ लोग मंदिर तक जाने नहीं देते

जैसे भगवान उनकी कोई

पुश्तैनी जागीर है।



ये जो नेता जी बेंच रहें है देश

जैसे अंग्रेजों के हाथों बेंचा था

कुछ गद्दार राजाओं और बादशाहों ने

और मिलकर खाई थी मलाई

तथा नारा दिया था-

अंग्रेजी हिन्दी भाई भाई ।



ये गुरु जी

स्कूल में लेकर बैठ जातें है अखबार

अध्यापन के समय पढ़ते रहते हैं समाचार

व विधार्थीगण कक्षा से होते है दूर

बाजार में घूम घूम कर देखते हैं हूर

आजकल की शिक्षा बस इसिलिए है मशहूर।



सरकारी कार्यालय में

दस्तखत के लिए नहीं होता समय

साहब के पास ,

लेकिन कुर्सी पर उॅघने के लिए

समय ही समय है उनके पास

करो आग्रह तो नहीं आता रास

पकड़ा दो नंबरी तो बन जाओगे खास

फटाफट होगा आपका काम

बाद में साहब स्वयं बोलेगे

आपको राम राम ।



चैगिर्द होता है

धर्म के नाम पर राजनीति

होता ही रहता है आए दिन

भगवान के नाम पर झगड़े

होतें हैं दंगे

जलती हैं बस्तियाॅ

मरते हैं लोग

और पीड़ीत को नहीं मिलती समय से दवा ।



तब एक क्रान्ति की

शरीर में चलती है हवा

सरी घटनाऐं करती हैं अतंःस्पर्श

फिर बिजली सी कौंधती है

हाथों की उॅगलियों तक

तब उठता है कलम पननों पर उतारने व्यथा।


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