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शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

एक बार फिर....

चलो फिर एक बार
अनजान हो जाए

मिटा दें वो सभी यादें
जो केवल हमारी—तुम्हारी थी
जिनमें सिर्फ मैं और तुम थे

कॉफी के साथ हुई उन
हज़ारों बातों को भुलाकर
फिर मंगाते है उम्मीदों की 
कॉफी का एक नया—ताजा कप

और हां इस बार कॉफी में 
शक्कर मैं मिलाउंगी
तुम अक्सर कंजूसी कर 
जाते हो

चलो फिर एक शुरूआत करें
अनजान बन कर

8 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर.अच्छी रचना.रुचिकर प्रस्तुति .; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ
    कभी इधर भी पधारिये ,

    उत्तर देंहटाएं
  2. भाव स्तर पर अच्छी रचना ,पुराना छोड़ आगे बढ़ो ,कुछ नया करो और अभी करो।

    उत्तर देंहटाएं
  3. पुराने रास्ते से निकलने का यही तरीका है -अच्छी रचना
    नई पोस्ट साधू या शैतान
    latest post कानून और दंड

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

      हटाएं
  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक आज शनिवार (28-09-2013) को ""इस दिल में तुम्हारी यादें.." (चर्चा मंचःअंक-1382)
    पर भी होगा!
    हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं