मित्रों!

आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।


समर्थक

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

समरथ काहुना दोषु गोसाईं ,रबि पावका सुरसरि कि नाईं

श्रीमद भगवदगीता चौथा अध्याय :श्लोक चौदहवाँ 


न मां कर्माणि लिम्पन्ति , न मे कर्मफले स्पृहा 

इति मां योअभिजानाती ,कर्मभिर न स बध्यते 


मुझे कर्म का बंधन नहीं लगता ,क्योंकि मेरी इच्छा कर्म फल में नहीं रहती है। इस रहस्य को जो व्यक्ति भलीभांति समझकर मेरा अनुसरण करता है ,वह भी कर्म के बंधनों से नहीं बंधता है। 

भाव यह है जो कोई  सर्वप्रमुख होना चाहे ,वह सबसे पीछे होकर सबका सेवक बने। सारे कर्म प्रार्थना सहित -मात्र व्यक्तिगत लाभ के लिए न करके किसी अच्छे उद्देश्य और जनकल्याण के लिए करने चाहिए। 

Activities do not taint me ,nor do I desire the fruits of action .One who knows me in this way is never bound by the karmic actions of work .

God is all pure ,and whatever he does also becomes pure and auspicious .The Ramayana states:


samaratha  kahun nahin doshu gosain,rabi pavaka sursari ki nain.

समरथ काहुना दोषु गोसाईं ,रबि पावका सुरसरि कि नाईं 

"Pure personalities are never taited by defects even in contact with impure situations and entities ,like the sun ,the fire , and the Ganges." The sun does not get tainted if sun light falls on a puddle of urine .The sun retains its purity ,while also purifying the dirty puddle .Similarly if we offer impure objects into the fire ,it still retains its purity -the fire is pure ,and whatever we pour into it it also gets purified .In the same manner ,numerous gutters of rainwater merge into the holy Ganges ,but this does not make the Ganges a gutter -the Ganges is pure and it transforms all those dirty gutters into the holy Ganges .Likewise ,God is not tainted by the activities he performs .

Even Saints who are situated in  God-consciousness become transcendental to the material energy .Since all their activities are effectuated in love for God ,such pure hearted Saints are not bound by the fruitive reactions of work .The Shrimad Bhagvatam states :

             yat pada pankaja paraga nisheva tripta 

             yoga prabhava vidhutakhila karma bandhah 

              saviram charanti munayo ' pi na nahyamanas 

              tasyechchhayatta vapushah kuta eva bandhah 

"Material activities never taint the devotees of God who are fully satisfied in serving the dust of his lotus feet .Nor do material activities taint those wise sages who have freed themselves from the bondage of fruitive reactions by the power of Yog .So where is the question of bondage for the Lord himself who assumes his transcendental form according to his own will ?"

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक आज शनिवार (28-09-2013) को ""इस दिल में तुम्हारी यादें.." (चर्चा मंचःअंक-1382)
    पर भी होगा!
    हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं