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बुधवार, 11 सितंबर 2013

परमात्मा सर्वआत्माओं के प्रति तटस्थ रहता है। किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं करता है। यदि कर्ता वह होता तो या तो हम सब अच्छा कर्म करते ,साधु होते। या फिर बुरा करके सबके सब राक्षस होते।

Free Will vs God is the Doer

प्रश्न :आखिर सर्वप्रिय रचता  परमात्मा ने आत्माओं की रचना कर अपनी ही रचना को  इस  दुखपूर्ण संसार में दुःख झेलने के लिए क्यों अकेला छोड़ दिया  ?

उत्तर :एक दृष्टांत हाज़िर है इस जिज्ञासा के शमन हेतु -एक बहुत धनवान व्यक्ति था। उसका एक पंद्रह साला बेटा था। एक मर्तबा बेटा पिता के दफ्तर में नितांत अकेला था। तभी उसके हाथ एक पंद्रह साल पुराना रिसाला (अखबार )आ गया। सुर्खी बनी हुई खबर पर उसकी नजर पड़ी -अरबपति ने बच्चा गोद लिया। यह अरबपति और कोई नहीं उसका पिता  ही निकला। कुछ समय बाद जब वह धनवान व्यक्ति लौटा किशोर ने अशिष्टता पूर्वक पूछा -पिता श्री यह जो कुछ लिखा है सत्य है ?

अमीर बाप ने कहा बेटे यह सत्य है। इसका मतलब मैं आपका बेटा नहीं हूँ-बेटे ने कहा। पिता ने सहमति  में सिर  हिला दिया। उसने लगभग सदमे की स्थिति में आते हुए कहा - फिर मुझे क्यों गोद लिया। 

बेटे मेरे पास दुनिया की सारी  धन दौलत सारा एश्वर्य ज़रूर था लेकिन मैं नि :संतान था। मेरा कोई वारिस न था। मैं किसे वरसा देता ?

ऐसे ही परमात्मा के पास सब कुछ है लेकिन संतान के बिना वह उस सबका क्या करता ?लेकिन यह वरसा उसे ही मिलता है जो उसकी याद में रहते हुए ही सब कर्म करता है। परमात्मा वस्तु का नहीं  प्रेम का भूखा है। जो उसे प्रेम करता है वही  उसको प्राप्त होता है। वस्तु चढ़ाने वाले को वरसा नहीं मिलता है बलि चढ़ना पड़ता है प्रेम में। 

प्रश्न :जब हम उस परमपिता परमेश्वर के अंश हैं फिर हम गलतियों पे गलतियां क्यों करते जाते हैं ?

उत्तर :

We Suffer because We Have Chosen Maya 

सागर की हर बूँद भी खारी होती है। बेशक हम आत्माएं भी परमात्मा की तरह ही अपने मूल रूप में दिव्य और पवित्र रहती हैं लेकिन उसका ही अंश होने के कारण उसी का एक और गुण हमारे अन्दर आ गया। स्वतंत्र सत्ता प्राप्त है हमें मनमानी करने की। अपने कर्मों के नियंता हम स्वयं हैं। अब यह हमारे ऊपर है हम संसार की तरफ जाए या परमात्मा की  तरफ। उसकी श्रीमत (मनमना भव ,मध्या जी भव ) पर चले या अपनी मन मत पर।  

परमात्मा की तरफ पीठ करते ही माया हमें अपनी गिरिफ्त में ले लेती है। अज्ञान का पर्दा पड़ जाता है हमारी आँखों पर। इसीलिए हम एक के बाद दूसरी गलती करते जाते हैं। 

We have the Free Will to Act 

प्रश्न :जब करन-करावन हार वह परमात्मा ही है फिर आत्मा अपने किये (कर्म की भोगना )कर्म फल को  क्यों भोगती है ? 

उत्तर :कई लोग पुरुषार्थ (आत्मा के उत्थान के लिए किया गया कर्म )करना ऐसा बूझकर छोड़ देते हैं -हमारे हाथ में क्या है। हमारे अंदर जो परमात्मा है करनकरावन हार तो वही है।जैसी वह प्रेरणा देता है वैसा ही कर्म हम करते हैं। लेकिन यह दर्शन व्यवहारिक नहीं है जीवन और जगत के अनुकूल नहीं है। कृपया निम्न पे गौर करें :

(१) यदि करता परमात्मा ही होता तो फिर हमसे गलती ही क्यों होती  ?इसका मतलब है कर्म हमारी मर्जी से हो रहा है। 

(२ )यदि परमात्मा करता होता तो भोगना भी वही झेलता। उसके किए की भोगना हम क्यों झेलते फिर। लेकिन यह सृष्टि कर्म प्रधान है जैसा यहाँ बोवोगे वैसा ही काटोगे।  

कर्म प्रधान विश्व करि राखा ,

जो जस करहिं ,सो तस फल चाखा। 

(३)परमात्मा सर्वआत्माओं के प्रति तटस्थ रहता है। किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं करता है। यदि करता वह होता तो या तो हम सब अच्छा कर्म करते ,साधु होते। या फिर बुरा करके सबके सब राक्षस होते। 

लेकिन यह संसार विविधताओं से भरा हुआ है। प्रहलाद भी यहीं हुए हैं हिरण्यकशिपु  भी। इसका मतलब कर्म करने की स्वायत्ता सबको प्राप्त रही आई है। 

(४) यदि सभी कर्म उसकी प्रेरणा से ही होते फिर उसे वेदों ,उपनिषदों की रचना ही क्यों करनी पड़ती। श्रीमत पे चलने का मार्ग(भगवान् की तरफ ले जाने वाला मार्ग ) बतलाने  की ज़रुरत ही क्यों पड़ती। फिर तो उसे बस यही कहना था -हे विश्व की आत्माओं सब कुछ करने वाला मैं ही हूँ आपको अच्छे और बुरे कर्म को बूझने की ज़रुरत ही नहीं है। 

बेशक परमात्मा का हमारे अन्दर वास है और वह हमें काम करने की ताकत भी  देता है।लेकिन उस ताकत का हम इस्तेमाल कैसे करते हैं इसमें परमात्मा का कोई दखल नहीं रहा है। न्यूक्लीयर एनर्जी से बिजली भी बनती है क्रूज़ मिसायल भी। 

भगवान् ने हमें यह चक्षु देखने के लिए ही दिए हैं। क्या देखना हैं कैसे देखना है यह हम पर ही निर्भर करता है। आप चाहे भगवद भक्ति के लिए मंदिर जाएँ देव प्रतिमाओं के दर्शन करें या नेट पर वैब नर -नारियों को देखें दिगम्बर स्वरूप में।

I with a civilized eye is soul conscious .I with a criminal eye is body conscious .

एक रास्ता (श्रीमत )भगवान् की तरफ ले जाता है दूसरा (मनमत )देह और देह के संबंधों की तरफ। 

ख़ुदा  के वास्ते ख़ुदा पे तोहमत न लगाओ मेरे लाडलों ।   

ॐ शांति 




1 टिप्पणी:

  1. माया ठगिनी जग मुआ देह गिरी पापिन भई,ठगिनी जीवन ठग गई,ज्योति जीवन की बुझ गई, माया सापिन नागिन है,बहुत ख़ूब सर जी

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