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गुरुवार, 19 सितंबर 2013

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा : श्रीद्धावंतोअनसूयन्तो मुच्यन्ते तेअपि कर्मभि :

श्रीमदभगवद गीता अध्याय तीन :श्लोक(३१ -३ ६  )

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा :

श्रीद्धावंतोअनसूयन्तो मुच्यन्ते तेअपि  कर्मभि :

ye me matam idam nityam anutishthanti manavah 

shraddhavanto 'nasuyanto  muchyante te 'pi karmabhih 

ye -who ;me -my ;matam-teachings ;idam -these;nityam -constantly ;anutishthanti-abide by ;manavah-human beings ;shraddha-vantah-with profound faith ;anasuyantah-free from cavilling ;muchyante-become  free ;te -those ;api-also;karmabhih -from the bondage of karma .

Those who abide by these teachings of mine ,with profound faith and free from cavil ,are released from the bondage of karma .

Cavil (-ils,-illing,-illed) is to make objections about something on small and unimportant points ,a trivial and unreasonable objection .

Very beautifully ,the Supreme Lord terms the siddhanta (principle )explained by him as mata (opinion ).An opinion is a personal view ,while a principle is universal fact .Opinions can differ amongst teachers ,but the principle is the same ,but in the Gita ,the Lord has named the principle explained by him as opinion .By his example ,he is teaching us humility  and cordiality .

Having given the call for action ,Shree Krishana now points out the virtues of accepting the teachings of the Bhagvat  Gita with faith and following them in one's life .Our prerogative as humans is to know the truth and then modify our lives accordingly .In this way ,our mental fever (of lust ,anger ,greed ,envy ,illusion ,etc.)gets pacified.

Prerogative :Individual right or privilege is a privilege or right that allows a particular person or a group to give orders or make decisions or judgments.

Prerogative :Special right that somebody/something  has.

किसी व्यक्ति या वस्तु का विशेष अधिकार उसका प्रिरागटिव कहलायेगा।  

In the previous verse ,Shree Krishna had clearly explained to Arjun to offer all works to him .But he knows that this statement  can cause ridicule from those who have no belief in God and rebuke from those who are envious of him .So ,he now emphasizes the need for accepting the teachings with conviction.He says that by faithfully following these teachings one becomes free from the bondage of karma .But what happens to those who are faithless ?Their position is explained next. 

(३१ -३२ )जो मनुष्य बिना आलोचना किये , श्रद्धापूर्वक मेरे इस उपदेश का सदा  पालन करते हैं ,वे कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं ;परन्तु जो आलोचक मेरे इस उपदेश का पालन नहीं करते , उन्हें अज्ञानी ,विवेकहीन तथा खोया हुआ समझना चाहिए। 

मनुष्य की  आदत होती है वह अपनी रूचि के अनुसार भी गुण दोषों  से असर ग्रस्त होता है मसलन   पाकिस्तान में  कुछ बुरा होने पर कई भारत के लोगों को और भारत में कुछ अहित होने पर कई पाकिस्तान सोच के लोगों को अच्छा लग सकता है। अधिकतर हमारा मन बहिर्मुखी रहता है। हमारा मन बुरा देखेगा ,बुराई से प्रभावित होगा तो हम अन्दर से काले होते जायेंगे ,अच्छा देखेंगे तो मन उज्जल(उज्जवल ) होता जाएगा। हम जो देखते हैं वही हो जाते हैं। 

जो मेरे इस मत के अनुसार न चलके हर जगह बस कमियाँ ही ढूंढते   हैं ,अच्छी चीज़ों में भी बुराई खोज लेते हैं उन्हें नष्ट प्राय :ही  समझो ,वह हर प्रकार के ज्ञान से वंचित रहते हैं। उनका अधोपतन सुनिश्चित समझो। 

(३३)सभी प्राणी अपने स्वभाव वश ही कर्म करते हैं। ग्यानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार कार्य करता  है। फिर इन्द्रियों के निग्रह का  क्या प्रयोजन  है ?

यह  ठीक है ,हम अपनी इन्द्रियों का  दमन नहीं कर सकते ;न वैसा करना चाहिए ,किन्तु हमें अपने क्रमिक विकास के लिए मानवीय जीवन की विवेकशक्तियों का प्रयोग करते हुए इन्द्रियों का दास नहीं ,स्वामी होना चाहिए। इन्द्रियों के नियंता होने का सर्वोत्तम तरीका है अपनी इन्द्रियों का प्रयोग श्रीकृष्ण की  सेवा में करना।  

जब तक ज्ञान शब्दों की पोशाक ही पहने रहेगा हमारे जीवन में नहीं उतरेगा हमारा कल्याण नहीं होगा। व्यवहार में होने पर ही जीवन में सद-  गति हो पायेगी। 

(३४ )प्रत्येक इन्द्रिय के भोग में राग और  द्वेष ,मनुष्य के कल्याण मार्ग में विघ्न  डालने वाले ,दो महान शत्रु रहते हैं। इसलिए मनुष्य को राग और द्वेष के वश में नहीं होना चाहिए।पूर्णता के मार्ग में यही दो बाधाएं हैं।  

जितनी भी इन्द्रियाँ हैं उनके अपने-अपने   विषय हैं। उन इन्द्रियों पर अपने विषयों के प्रति राग और द्वेष दो शत्रु बैठे हुए हैं। जिन्हें भी जीवन में सम्पूर्णता चाहिए राग और द्वेष उनके जीवन में नहीं आना चाहिए। आँखों को अच्छा दिखे तो  आसक्त नहीं होना है बुरा दिखे तो मुंह नहीं बिद्काना है। ये दोनों ही कल्याण  मार्ग में विघ्न  पैदा करने वाले दो पातक हैं शत्रु हैं। जब राग द्वेष से मन मुक्त हो जाता है तभी भगवान्  की प्राप्ति होती है। मनुष्य पूर्णता को प्राप्त करता है। 

(३५ )अपना गुण रहित सहज और  स्वाभाविक कार्य आत्मविकास के लिए दूसरे अच्छे  अस्वाभाविक कार्य से श्रेयस्कर है। स्वधर्म के कार्य में मरना भी कल्याण कारक है। अस्वाभाविक कार्य हानिकारक होता है। 

पानी से दूध ज्यादा गुणकारी होता है लेकिन  मछलियों को पानी में छोड़ दिया जाए तो वह खुश नहीं होंगी। नीम अगर आम बनना चाहेगा तो अपने भी गुण खो देगा। भगवान् यहाँ वर्ण आश्रम की तरफ इशारा कर रहे हैं। अपने स्वधर्म स्वभाव में चलने से ही हमारा कल्याण होगा। दूसरे को देखकर अपने स्वभाव से बाहर  जाना अपने विनाश को दावत देना है। 

जाको काम ताहि को सोहे। 

जो उस काम में हाथ डालता है जिसके लिए वह बना ही नहीं है ,उसे अवश्य ही असफलता मिलती है। स्वाभाविक कर्म तनाव पैदा नहीं करता और रचनात्मकता का स्रोत है। अपने स्वभाव के विपरीत कर्म न केवल तनाव पूर्ण होता है ,बल्कि फलदायक भी नहीं होता और उसमें आध्यात्मिक विकास और  उन्नति के लिए भी मुक्त समय नहीं मिलता। 

(३६ )अर्जुन बोले -हे कृष्ण ,न चाहते हुए भी बलपूर्वक बाध्य किए हुए के समान (obsessive compulsive behavior)किस्से प्रेरित होकर मनुष्य पाप का आचरण करता है ?

न चाहते हुए भी व्यक्ति किस्से प्रेरित होकर पाप की ओर प्रवृत्त   होता है ?कौन है क्या है वह तत्व जो उसे पाप की ओर बल पूर्वक बलात  खिंचे जा रहा है? 

SPRITUAL DIALECTICS PART III

 लेकिन ईश्वर तो सर्व शक्ति मान है सब कारणों का कारण हैऔर स्वयंम उसका कोई कारण नहीं है। 

Question .In Hinduism ,we have many Gods -Krishna ,Ram ,Shiv ,Vishnu ,Durga ,to name a few .Are they all different Gods ?And if so ,are some of them bigger than the others ?

आइन्स्टाइन ने एक मर्तबा कहा था -आकाश काल में एक कण एक समय पर एक ही जगह अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवा सकता है एक ही जगह हो सकता है एक साथ दो जगह नहीं हो सकता या तो वह यहाँ है या फिर वहां। 

स्टीवन हाकिंग्स ने कहा था -यदि कोई ईश्वर है तो वह कार्य -कारण सम्बन्ध से मुक्त नहीं हो सकता। 

लेकिन ईश्वर तो सर्व शक्ति मान है सब कारणों का कारण हैऔर स्वयंम उसका कोई कारण नहीं है। 

He is the cause of all causes and yet Himself without a cause .

इसलिए वह अपनी योगमाया से एक साथ एक ही समय पर अलग -अलग जगहों  पर अलग- अलग नाम रूपों में हो सकता है। 

Answer :These are not different Gods ;they are different forms of the same Supreme Lord .

एकहू ओंकार निराकार सतनाम। 

We too have many personalities .When a man goes to office ,he is dressed formally .When he takes a walk in the park ,he is dressed semi -formally .And when he is at home ,he is dressed very informally .His wife does not become confused ,thinking ,"I had married one man .How come I have three husbands ?She knows very well that these are different appearances of her one husband .Similarly ,Krishna ,Ram ,Shiv ,Vishnu ,etc .are all different forms of the same one God .We should not consider any one of these as bigger or smaller than the others.This is stated in the Vedas:

एकं संतम बहुधाय कल्पयन्ति (ऋग्वेद १० -११ ४. ५)

ekam santam bahudhaya kalpayanti( Rig Veda 10-114.5)

"The absolute Truth is one but has been described in a variety of ways by the saints.

While comparing the example of a worldly person with God ,we must also note the difference.A worldly person is not all-powerful ;he cannot exist in all three places at the same time .However ,God is supremely powerful .He can manifest in as many forms as He wishes and exist in all of them simultaneously .Hence ,He eternally exists in the forms of Krishna ,Ram ,Shiv ,Vishnu ,etc.The true devotee respects all these forms of God ,although doing devotion to any one of Them .

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