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बुधवार, 25 सितंबर 2013

श्रीमदभगवद गीता अध्याय चार :श्लोक (६ -१० ) प्रभु के अवतार का उद्देश्य

श्रीमदभगवद गीता अध्याय चार :श्लोक (६ -१० )


प्रभु के अवतार का उद्देश्य 


श्रीभगवानुवाच 

बहुनि मे व्यतीतानी ,जन्मानि तव चार्जुन ,


तान्यहं सर्वाणि ,न त्वं वेत्थ परंतप। (४. ६ )


श्री भगवान् बोले -हे अर्जुन ,मेरे और तुम्हारे बहुत सारे जन्म हो चुके हैं 

,उन सबको मैं जानता हूँ ,पर तुम नहीं जानते।






अजोअपि सन्न अव्ययात्मा ,भूतानां ईश्वरोपि सन ,


प्रकृतिम स्वाम अधिष्ठाय ,संभवाम्यात्ममायया। (४ ७ )


यदयपि मैं अजन्मा अविनाशी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर हूँ ,फिर 

भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ। 



योगमाया (अर्थात ब्रह्मज्योति ,नूर )भगवान् कृष्ण की आनंद शक्ति है। 

महामाया योगमाया का 

आंशिक प्रतिबिम्ब है।कालमाया महामाया का प्रतिबिम्ब है।  माया ब्रह्म 

की अलौकिक ,असाधारण 

और रहस्यमयी शक्ति है।महामाया ,कालमाया और माया को आदि 

प्रकृति भी कहा गया है। 

प्रकृति को माया का प्रतिबिम्ब समझा जाता है।इस प्रकार योगमाया 

माया और प्रकृति दोनों का 

उद्गम है।गुरु नानक देव ने कहा -"प्रभु  ने माया रची है ,जो हमें भुलावा 

देती है  और नियंत्रण में 

रखती है।"माया का अर्थ सत्य की अवास्तविक ,काल्पनिक और भ्रामक 

छवि भी है। शंकराचार्य ने 

माया को मिथ्या (इल्यूज़न) कहा है।माया की शक्ति के कारण मनुष्य को 

ब्रह्म से पृथक  विश्व के 

अस्तित्व  का  आभास होता है। ब्रह्मज्योति अथवा योगमाया ब्रह्म की 

अदृश्य ,संभावित 

,अन्तर्निहित ऊर्जा (Potential Energy )है ,और माया ब्रह्म की कर्म 

शक्ति (Kinetic Energy 

)है। अग्नि और ताप की भाँति माया और योगमाया अविच्छेद्य हैं। माया 

शब्द का प्रयोग सामान्य 

लोगों को जगत का रहस्य समझाने के लिए रूपक के रूप में भी किया 

जाता है। मन भी माया का 

एक रूप है। 


यदा यदा ही धर्मस्य ,ग्लानिर भवति भारत ,

अभ्युत्थानम अधर्मस्य ,तदात्मानं सृजाम्यहम। (४. ७  )


परित्राणाय साधूनां ,विनाशाय च दुष्कृताम ,

धर्मसंस्थापनाथार्य ,संभवामि युगे युगे। (४. ८  )

हे अर्जुन जब जब संसार में धर्म की हानि और अधर्म  की वृद्धि होती है 

,तब तब अच्छे लोगों की 

रक्षा ,दुष्टों का संहार तथा धर्म की संस्थापना के लिए मैं ,परब्रह्म 

परमात्मा ,हर युग में अवतरित होता हूँ। 


जन्म कर्म च मे दिव्यं ,एवं यो वेत्ति तत्त्वत:'

तयक्त्वा देहं पुनर्जन्म ,नैति माम एति सोर्जुन।(४. ९ )



हे अर्जुन ,मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इसे जो मनुष्य  भलिभाँति  जान 

लेता है ,उसका मरने के 

बाद पुनर्जन्म नहीं होता तथा वह मेरे लोक ,परमधाम को प्राप्त करता है।  


वीतरागभयक्रोधा ,मन्मया माम उपाश्रिता :

बहवो ज्ञानतपसा ,पूता मद्भावं आगता :



राग ,भय  और क्रोध से रहित ,मुझमे तल्लीन ,मेरे आश्रित तथा 

ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर 

,बहुत से मनुष्य मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।  




विशेष :इस्लाम ,ईसाई ,सिख धर्म वंशों आदि में ईश्वर का स्वरूप अव्यक्त ,निर्गुण ,निराकार ही माना गया है लेकिन सनातन भारत धर्मी समाज में ऐसा माना गया है भगवान् सगुण  रूप में भक्तों के बीच वक्त ज़रुरत पड़ने पर आते रहते हैं। 

एक डाकू का पुलिस के संरक्षण में दिखाई देना तथा एक नेता का भी ऐसे ही दिखाई देना एक ही बात नहीं है। जहां डाकू को पुलिस अपने नियंत्रण में लिए रहती है वहीँ नेता के नियंत्रण में पुलिस रहती  है। भगवान् अपनी प्रकृति ,माया को अपने अधीन करके ही प्रकट होते हैं।हमें माया नियंत्रण में लिए रहती है। इस माया रावण की गिरिफ्त से ही छूटना है। इसलिए भगवान् कहते हैं मेरे अवतरण के हेतु को जानो।  

मेरे अवतरण का हेतु जन कल्याण है :

जब जब अधर्म सर उठाता है धर्म की हानि  होती है मैं अपने अव्यक्त स्वरूप को साकार में प्रकट करता हूँ। धर्म वस्तु का मूल गुण है जैसे अग्नि का ताप ,जल का शीतलता ,वैसे ही प्राणियों का मूल गुण है भलाई करना। बुराई छोडके अच्छाई ग्रहण करना। जब जब हमारी इस उदारता के ऊपर संकीर्णता हावी होने लगती है पैशाचिक शक्तियां माया रावण का राज्य पृथ्वी को बंदी बना लेता है मैं आता हूँ। साधुओं के परित्राण दुष्टों के विनाश के लिए ही मैं आता हूँ। हनुमान चालीसा में गाया  गया  है :

साधू संत के तुम रखवारे ...

कहने का भाव यह है हमारे जीवन में साधुता होने पर भगवान् की सारी  सुरक्षा हमें  स्वत : ही प्राप्त होने लगती है। भगवान् हमारे अहंकार रुपी रावण को ही नष्ट करते हैं। भगवान् की खुराक भगवान् का भोजन है अहंकार।अगर हमने अपनी सज्जनता को बचाए रखा अपना भ्रष्ट आचरण ,अपना दुराचार दूर कर लिया तो समझ लो हमने भगवान् का ही काम किया। एक एक करके हम अपने जीवन से बुराई को निकालते गए अच्छाई को पिरोते गए तो समझ लो धर्म की ही स्थापना हो रही है। भगवान् का ही काम हो  रहा है।हमें  अपने जन्म और कर्म दोनों को दिव्य बनाना चाहिए  तभी गोलोक में हमें दिव्य शरीर प्राप्त होगा हम भगवान् के सानिद्ध्य में रहेंगे। 

निस्वार्थ भाव से ज़रुरत मंद की मदद करने से हमारा जीवन दिव्य बनता है। रात को एक सन्यासी की तरह सोवो। पता नहीं सुबह हो न हो। और हर सुबह का स्वागत करो कुछ नया करने के लिए कुछ अच्छा करने के मंसूबे बांधते हुए। यह शरीर तो हमें  छोड़ना ही छोड़ना  है। भगवान् को जानो। चरम चक्षु से नहीं  दिव्यता से ज्ञान से।  

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 27.09.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (26-09-2013) चर्चा- 1380 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं