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शनिवार, 7 सितंबर 2013

जागो युवाओं

उठो जागो ओ देखो हम पतन  कि ओर जा रहे |
प्रमन के सूर्य पर बादल ये काले फिर से छा रहे | 

झगड़ते वर्ग को लेकर  कही पर धरम को लेकर ,
जी रहे एक झूठी शान झूठे भरम को लेकर |
झगड़ कर आप ही शक्ति को अपनी  हम घटा रहे|  
प्रमन के सूर्य पर बादल ये काले फिर से छा रहे|

जिसे अपना समझ  माँ भारती ने प्यार से पाला,
उसी कि साजिशो ने देश को बरबाद कर डाला |
निरख  ये दृश्य केवल अश्रुधारा हम बहा रहे |
प्रमन के सूर्य पर बादल ये काले फिर से छा रहे| 

युवाओं अब  उठो न देश यूँ बर्बाद होने दो ,
विदेशी ताकतों को अब नहीं आबाद होने दो |
यही वो लोग है  आपस में हम को जो लड़ा रहे |
प्रमन के सूर्य पर बादल ये काले फिर से छा रहे| 

बचे यह देश हमको एक होना ही पडेगा अब ,
करें  प्रण आज से आपस में कोई न लडेगा अब |
हमारी नफरतो का लाभ शत्रु गण  उठा रहे|
प्रमन के सूर्य पर बादल ये काले फिर से छा रहे|  

3 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसी भावना सभी में जागे। ………. सुन्दर कविता

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - रविवार-8/09/2013 को
    समाज सुधार कैसे हो? ..... - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः14 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  3. सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज मंगलवार (10-09-2013) को मंगलवारीय चर्चा 1364 --गणेशचतुर्थी पर विशेषमें "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    आप सबको गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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