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गुरुवार, 19 सितंबर 2013

मनुष्य के शत्रु ...डा श्याम गुप्त ....



                         


                              मनुष्य के शत्रु ...


        यजुर्वेद,  ईशोपनिषद  एवं गीता में ईश्वर प्राप्ति के मूलतः तीन उपाय बताये गए हैं | जो तत्काल  

प्रभावी, सरल एवं कठिन मार्ग  क्रमशः ...भक्ति योग, कर्म योग एवं ज्ञान योग हैं...| इनका पालक व्यक्ति  

स्थिरप्रज्ञ व संतुष्ट रहता है, स्वयं में स्थिर, आत्मलय, ईश्वरोन्मुख |  ईशोपनिषद् का प्रथम मन्त्र इन तीनों  

का  वर्णन करता हैं....

           ईशावास्यं इदम सर्वं, यद्किंचित जगत्यां जगत  ....भक्तियोग का ...विश्वास व आस्था का  

मार्ग है ...सब कुछ  ईश्वर का, मेरा कुछ नहीं, सब समाज का है|

          तेन त्यक्तेन भुन्जीता ....कर्मयोग का मार्ग....कर्म आवश्यक है परन्तु निस्वार्थ कर्म, परमार्थ  

एवं त्याग के  भाव से कर्म व भोग |

         मा गृध कस्यविद्धनम... ज्ञान का मार्ग ...विवेक का मार्ग.. अकाम्यता .. किसी के भी धन व स्वत्व  
की इच्छा व  हनन नहीं करना चाहिए,... वित्तेषणा, पुत्रेषणा, लोकेषणा..समस्त इच्छाओं का त्याग ...यह धन  
किसका हुआ  है इसका ज्ञान |  


                   तो इस में अवरोध क्या है ? उपरोक्त पर न चलने से एवं न चलने देने हेतु रजोगुण रूपी तीन  

भाव मन  में उत्पन्न होकर विचरण करते हैं जो शत्रु रूप में मनुष्य को भटकाते हैं....काम, क्रोध व लोभ |  

वस्तुतः मूल  शत्रु काम ही है अर्थात कामनाएँ, इच्छाएं ..  वित्तेषणा, पुत्रेषणा, लोकेषणा ....शेष उसके प्रभावी  
रूप हैं |  काम  अर्थात कामना, प्राप्ति की इच्छा से प्राप्ति का लोभ..विघ्न से क्रोध, क्रोध से सम्मोह, मोह, मूढ़  
भाव से स्मृतिभ्रम एवं मानवता नाश | काम नित्य बैरी कहा गया है यह दुर्जय है एवं इन्द्रियाँ मन व बुद्धि में  

स्थित यह  ज्ञान को आच्छादित कर देता है |  इन्द्रियों से परे मन बुद्धि व आत्मा में स्थित होना चाहिए ...अतः ..

       
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्यार्थ मनोगतान |
       अत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितिप्रज्ञस्तदोच्ये |......गीता २/५५

                जो सम्पूर्ण कामनाओं को भली भाँति  त्याग देता है  और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है वह स्थितिप्रज्ञ है |
       
        निराशीर्यत चित्तात्मा त्यक्त सर्वपरिग्रह|
        शारीरं केवलं कर्म कुर्वप्राप्नोतिकिल्विषम |.....गी 4/21
               .....जो बिना इच्छा अपने आप प्राप्त कर्मों पदार्थों से संतुष्ट है उसके समस्त किल्विष समाप्त होजाते हैं|...एवं ..

         यःशास्त्र विधि मुत्सृज्य वर्तते कामकारतः |
        न स सिद्धिवाप्नोति न सुखं न परा गतिम् |...गीता १६/२३ 
             .....जो शास्त्र विधि त्यागकर मनमाना इच्छा से आचरण करते हैं वह न सुख पाता  है न सिद्धि न परमगति |

               काम क्रोध लोभ ...तीनों को शत्रु नहीं  अपितु  नरक का द्वार कहा गया है ..इन्हें त्याग देना चाहिए ..
       त्रिविधं नरकस्येदम द्वारं नाश्मनात्मन : |
       कामः क्रोधस्तधा लोभस्तस्मादेत्रयं त्यजेत|....गीता १६/२१  ....तथा .....

      दु;खे स्वनुदिग्नमन: सुखेषु विगतस्पृह |
      वीत राग भय क्रोधो,स्थितिर्मुनिरुच्यते |...गीता २/५६
             .....सुख –दुःख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता जिसके राग, भय ( जो इच्छित प्राप्ति होगी या नहीं का हृदयस्थ भाव होता है ), क्रोध समाप्त होगये हैं उसे मुनिगण स्थितप्रज्ञ कहते हैं |  इसप्रकार.....अंत में ...

        विहाय कामाय सर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह: |
       निर्ममो निरहंकारो स शान्तिमधिगच्छति ||...गीता १६/७१

              जो सम्पूर्ण कामनाओं का त्याग कर देता है, ममता रहित, अहंकार रहित और स्पृहा रहित होजाता है वही शान्ति प्राप्त करता है | वही स्थितप्रज्ञ है, आत्मलय है,  ईश्वरन्लय है,  मुक्त है |
 

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