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रविवार, 20 अप्रैल 2014

अपूर्ण इंसान-पथिक अनजाना—586 वीं पोस्ट



मनोविज्ञानी कहते हें कि यह इंसान

कभी भी पूर्ण नही हो सकता हैं
जन्म से लेकर शरीर त्यागने तक
अकेले जीवन गुजारना मुश्किल हैं
अन्य सभी जीव अपनी जीवन यात्रा
ताउम्र अकेले सहर्ष वे बीता जाते हैं
यह इंसान जन्म से मां बाप भाई व
बहनों में सहारा खोजता रह जाता हैं
यही चाहत उसकी विवाह उपरान्त भी
जीवनसंगनी व बच्चों से बनी रहती हैं
वृद्धावस्था में गर किसी बाह्य को वह
हमराज बनावे मित्र पर शंकित होता है
कहानी इक सबल जीव इंसान की जोकि
ताउम्र वह  सहारा खोजता रह जाता हैं
कभी खौफ से खुदा की चौखट पर खडा
कभी शक्ति व सत्ता के गलियारों में हो
कभी पारिवारिक बुजुर्गों के सामने आता
कभी आश्रितों के मध्य जाखडा होता हैं
कहावे खुद को सक्षम किन्तु रहेगा वो
आत्मविश्वास से सदैव अधूरा रहता हैं
पथिक अनजाना


3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (21-04-2014) को "गल्तियों से आपके पाठक रूठ जायेंगे" (चर्चा मंच-1589) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. इंसान कब पूरा हुआ है?पूरा होगा तो देवता न बन जाये?ईश्वर पूरा बनाने की गलती करेगा भी नहीं.सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं