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सोमवार, 21 अप्रैल 2014

युग परिवर्तन की बेला में—पथिकअनजाना-587 वीं पोस्ट

युग परिवर्तन की बेला में हमारे व्दारा जन्म जमी पर लिया गया
प्रकृति कृपा समाजिक सहयोग से पारिवारिककर्ता पद प्रदान किया
तब से डाली नींव हमने राज्य की प्रजातंत्र को प्रथम स्थान दिया
गर बचानी होआबरू तो रहें नाममात्र के राष्ट्रपति ऐसा हुक्म हुआ
प्रजातंत्र के ताबूत को मान कर सिंहासन ताजपोशी की मिली दुआ
सिंहासन के पीछे से चौर नही आदेश दिखाते जो जारी हमेने किया
कुछ हाल बाद तथाकथित आजादी देश की राजनीति का हो रहा हैं
देश नाच रहा अपनों के इशारों पर कही विदेशी आकाओ की धूम हैं
कैसी रची रचना खुदा पृथ्वी घूमती सौर मण्डल घूमता छूम ही छूम
परिवार मे कहने को राजा नाचता आश्रितों के मोहक इशारों पर  हैं
दफन खुद की उम्मीदे पर नाम तो हुआ शख्स जग के नजारों में हैं
पथिकअनजाना


1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (22-04-2014) को ""वायदों की गंध तो फैली हुई है दूर तक" (चर्चा मंच-1590) पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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