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रविवार, 13 अप्रैल 2014

प्रयासपूर्वक प्रेस से बटोरी गई सामिग्री :GLEANINGS FROM THE PRESS

manmohan-singh


चुनावों में फूटा 'बुक बम'!


आम चुनावों की सरगर्मी के बीच एक जोरदार 'बुक बम' फूटा है। इस बम के निशाने पर हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब 'द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर, मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ मनमोहन सिंह' ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। बारू ने अपनी किताब में मनमोहन सिंह को एक बेहद कमजोर पीएम बताया है। शुक्रवार को स्टैंड पर पहुंची इस किताब में यूपीए-1 सरकार के कार्यकाल के दौरान मनमोहन सिंह के कामकाज का पूरा लेखा-जोखा पेश करने का दावा किया गया है। पेश है किताब के चुनिंदा अंश :

मनमोहन कुर्सी पर थे, सत्ता में नहीं!
यूपीए के दूसरे कार्यकाल में मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री काफी कमजोर हो चुके थे। एक तरह से वह कठपुतली बन चुके थे। सिर्फ प्रमुख सरकारी नीतियों पर फैसला ही नहीं, बल्कि बड़े पदों पर नियुक्तियां भी सोनिया गांधी की मंजूरी के बाद ही की जाती थीं। दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री सोनिया गांधी और अपने सहयोगियों के सामने बेबस थे। वहीं मनमोहन सिंह ने भी सत्ता का केंद्र सोनिया गांधी को ही मान लिया था। पलोक चटर्जी के जरिए सोनिया गांधी मनमोहन सिंह पर अपना दबदबा बनाए रखती थीं। पलोक चटर्जी को सोनिया गांधी के कहने पर ही पीएमओ में नियुक्त किया गया था। चटर्जी के जरिए सोनिया उन फाइलों पर नजर रखती थी, जिन्हें प्रधानमंत्री क्लियर करने वाले होते थे। पलोक चटर्जी की सोनिया के साथ लगभग रोजाना मीटिंग होती थी। मीटिंग में उन्हें सोनिया को पूरे दिन की ब्रीफिंग देनी होती थी और जरूरी फाइलों को पीएम के क्लियर करने से पहले जरूरी निर्देश लेना होता था। मनमोहन सिंह कुर्सी पर जरूर थे, लेकिन सत्ता में नहीं थे।

कहीं और थीं शक्तियां
प्रधानमंत्री को कैबिनेट के मंत्रियों से अपने हिसाब से काम करवाने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी। उन्होंने न तो मंत्रियों का पोर्टफोलियों तय किया था, न ही कैबिनेट की बैठकों में ज्यादा कुछ दखलंदाजी की और इसी के चलते राजनीतिक मामलों की कैबिनेट कमिटी की धार धीरे-धीरे खत्म हो गई। हकीकत तो यह कि सत्ता की सारी शक्तियां कांग्रेस के कोर ग्रुप - अर्जुन सिंह, ए. के. एंटनी, प्रणब मुखर्जी और अहमद पटेल के हाथों में थीं।

सहयोगी दलों के नेताओं में कुछ ऐसे थे, जो मनमोहन सिंह के साथी थी, लेकिन पुराने कांग्रेसियों से उन्हें बहुत ज्यादा आलोचना झेलनी पड़ती थी। शरद पवार (जिनसे सोनिया के समीकरण बहुत अच्छे नहीं थे) मनमोहन के अच्छे दोस्त थे। कुछ ऐसा ही हाल लालू प्रसाद यादव और वायलर रवि के साथ था। वहीं ए. के. एंटनी और अर्जुन सिंह कैबिनेट में उनके धुर आलोचक थे। एंटनी सार्वजनिक जगहों पर भले ही चुप रहते थे, लेकिन प्राइवेट में वह प्रधानमंत्री की विदेश और आर्थिक नीतियों की जोरदार आलोचना करते थे। उस वक्त के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने वॉशिंगटन के एक ट्रिप से लौटने के तीन दिन बाद तक प्रधानमंत्री को अपनी यात्रा के बारे में कुछ नहीं बताया। अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील के मसले पर जब लेफ्ट पार्टियां कांग्रेस के खिलाफ हो गईं और लगने लगा कि शायद ए. के. एंटनी या सुशील कुमार शिंदे को मनमोहन सिंह की जगह नियुक्त कर दिया जाए तो एनसीपी (नैशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी) के प्रफुल्ल पटेल ने बारू को यकीन दिलाया था कि वह 'डॉक्टर साहब' के अलावा किसी और को समर्थन नहीं देंगे।

सोची-समझी राजनीतिक चाल
नैशनल अडवाइज़री काउंसिल यानी एनएसी को बनाने से साफ हो गया कि प्रधानमंत्री पद की कुर्सी छोड़ने का सोनिया का फैसला अंतरात्मा की आवाज नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक चाल थी। किताब के मुताबिक मनममोहन सिंह भी जल्द समझ गए थे कि सब कुछ सोनिया के पास से ही तय होने वाला था। सामाजिक विकास को लेकर जो भी प्रोगाम शुरू किए जाते, उसका सेहरा नैशनल अडवाइजरी काउंसिल के सिर बांधने की अजीब से जल्दबाजी थी। भारत निर्माण कार्यक्रम पीएमओ की तैयार की हुई एक योजना थी, जिसे उस वक्त के जॉइंट सेक्रेटरी आर. गोपालकृष्णन ने तैयार किया था।

मुझे क्रेडिट नहीं चाहिए
इसी तरह जब बात मनरेगा की आई तो उसका क्रेडिट लेने के लिए भी कुछ ऐसी ही कहानी दिखी। बारू लिखते हैं कि 26 सितंबर 2007 को मनमोहन सिंह का 75वां जन्मदिन था। राहुल गांधी कांग्रेस महासचिवों का एक प्रतिनिधिमंडल लेकर उन्हें शुभकामना देने 7 रेसकोर्स रोड पहुंचे। राहुल चाहते थे कि नरेगा को देश के सभी 500 ग्रामीण जिलों में बढ़ाया जाए। अहमद पटेल ने इस मीटिंग के बारे में एक बयान प्रेस में जारी करने के लिए बारू को दिया, लेकिन बारू ने प्रधानमंत्री को क्रेडिट दिलाने के लिए एक ट्विस्ट दे दिया। प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में इस बात का वादा किया था, इसलिए उन्होंने पत्रकारों को मेसेज किया। इसमें लिखा कि नरेगा की यह योजना प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर देश को तोहफा है, लेकिन बारू की यह कोशिश उलटी पड़ गई। पीएम ने बारू को तलब कर लिया। बारू ने मनमोहन सिंह से कहा कि पार्टी इस काम का सारा क्रेडिट राहुल गांधी को देना चाहती है, लेकिन मेरी नजर में आपको और रघुवंश प्रसाद सिंह (उस वक्त के ग्रामीण विकास मंत्री) को भी इस काम का बहुत बड़ा श्रेय जाता है। लेकिन, प्रधानमंत्री ने उन्हें झिड़क दिया और कहा कि मुझे अपने लिए किसी तरह का क्रेडिट नहीं चाहिए। फिर कुछ मिनट रुककर मनमोहन सिंह बोले, 'उन्हें सारा क्रेडिट लेने दीजिए। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं तो बस अपना काम कर रहा हूं।'

विदेश नीति पर पहल
प्रधानमंत्री ने मान लिया था कि घरेलू मसले उनके हाथ से निकल चुके हैं, इसलिए उन्होंने विदेश मामलों में कुछ पहल करने की कोशिश की। 2005 में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ भारत पाकिस्तान का मैच देखना चाहते थे तो मनमोहन सिंह की इच्छा उन्हें बुलाने की थी। वह मुशर्रफ को न्योते का प्रस्ताव लेकर लोकसभा भी गए, जबकि सहयोगियो को इस बात की भनक तक नहीं थी। पाकिस्तान के साथ शांति के लिए बातचीत की प्रक्रिया पूरी नहीं होने का मनमोहन सिंह को हमेशा मलाल रहेगा।

जब पीएम की नहीं चली
2009 में जब यूपीए का दूसरा कार्यकाल शुरु हुआ तो मनमोहन सिंह को लगा कि वह अपने हिसाब के मंत्री तय कर सकते हैं। उस वक्त वह अपने मुख्य आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन को वित्त मंत्री बनाना चाहते थे लेकिन सोनिया ने उनसे सलाह लिए बिना प्रणब मुखर्जी को वित्त मंत्री बना दिया। इतना ही नहीं, डी. राजा को मंत्री बनाने का फैसला भी मनमोहन सिंह की इच्छा के खिलाफ हुआ था। राजा को मंत्री बनाए जाने के बाद वह कुर्सी छोड़ना चाहते थे, लेकिन अपनी पार्टी और डीएमके के दवाब में ऐसा नहीं कर पाए। 2जी घोटाले से पहले ही ए. राजा को हटाने की कोशिश प्रधानमंत्री ने की थी, लेकिन दबाव के चलते वह इसमें भी नाकाम रहे थे। फाइनैंस मिनिस्टर रहते हुए प्रणब मुखर्जी बजट भाषण पर प्रधानमंत्री से चर्चा तक नहीं करते थे।

अब क्या कहना है बारू का
संजय बारू ने किताब में जो कुछ भी लिखा है, वह मनमोहन सिंह के 'मौनमोहन सिंह' होने के विपक्ष के आरोप पर एक तरह से मुहर ही लगा रहा है, लेकिन खुद बारू का कहना है कि उन्होंने किताब में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में ज्यादातर बातें पॉजिटिव ही लिखी हैं। उनका कहना है कि वह पीएमओ को पांच साल पहले ही छोड़ चुके हैं और उनकी किताब यूपीए-1 का एक संस्मरण भर है। बारू का मानना है कि अपनी किताब में उन्होंने ऐसी कोई गोपनीय बात का खुलासा नहीं किया है, जो गैरकानूनी हो। हालांकि उन्होंने साफ किया है यूपीए-1 के बारे में वह जो कुछ भी जानते हैं, उसका महज 50 फीसदी ही उन्होंने इस किताब में लिखा है।

गुनहगार से बेहतर है मजबूर PM का टैग!
नरेंद्र नाथ 

क्या यूपीए-2 के दौरान सत्ता के दो केंद्रों 10, जनपथ और 7, रेसकोर्स रोड के बीच सबकुछ ठीक नहीं था? क्या दोनों केंद्रों के बीच इगो की लड़ाई रही? क्या मनमोहन सिंह अपने खराब और कमजेार पीएम की ब्रैंड इमेज से आहत हैं? हाल के बरसों में सत्ता के गलियारे में ऐसी चर्चाएं आम रहीं। लेकिन, हर बार यह गॉसिप से आगे नहीं बढ़ीं। अब एक बार फिर यह मामला सुर्खियों में है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार और उनके बेहद करीब रहे संजय बारू की किताब में लगभग इन्हीं बातों की ओर इशारा किया गया है।

जानकारों के अनुसार, किताब को जारी करने के वक्त और प्रसंग के बीच कुछ संदेश छिपे हैं। दरअसल बीते साल जब राहुल गांधी ने दागी नेताओं को बचाने वाले आर्डिनेंस को फाड़ डाला था और इस फैसले को इडियट वाला बताया था, तो संजय बारू ने इसे पीएम का अपमान बताते हुए उन्हें इस्तीफा देने की सलाह दे दी थी। इस तरह बारू ने मनमोहन सिंह और 10, जनपथ के बीच कुछ ठीक नहीं होने के संकेत दे दिए थे।

इस किताब में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि 2009 के आम चुनाव के बाद मनोहन सिंह को लगने लगा था कि इस जीत का ज्यादा क्रेडिट उनके जिम्मे जाता है। ऐसे में वह अपनी अहमियत बढ़ाने लगे तो 10 जनपथ उन पर अंकुश कसने लगा। यह बात कितनी सही है, इसके कयास लगाने के बजाय असली घटनाक्रम में जाएं तो यूपीए-2 के अंतिम कैबिनेट विस्तार में यह विवाद सामने आया था कि किस तरह सोनिया गांधी की अनिच्छा के बाद भी प्रधानमंत्री ने अपने नजदीकी अश्विनी कुमार को कैबिनेट में शामिल किया था। जब बतौर कानून मंत्री अश्विनी कुमार और रेल मंत्री पवन कुमार बंसल विवादों में फंसे तो प्रधानमंत्री इन्हें हटाने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन सोनिया गांधी फौरन हटाने के पक्ष में थीं। बाद में सोनिया की जीत हुई।

इस किताब में मनमोहन सिंह को एक मजबूर लेकिन उसूल पर कायम रहने वाले पीएम के रूप में पेश किया गया है और इनके 10 साल के कार्यकाल में हुए तमाम घोटालों और दूसरे विवादों में उन्हें एक बेचारा बताया गया है। मनमोहन सिंह सम्मान के साथ फेयरवेल चाहते। ऐसे में उन्हें गुनहगार के बजाय मजबूर का टैग ज्यादा उचित लगा होगा। अब संजय बारू की किताब मनमोहन सिंह की मौजूदा ब्रैंड इमेज पर कितना असर डालेगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। 

प्रयासपूर्वक प्रेस से बटोरी गई सामिग्री :GLEANINGS FROM THE PRESS 

http://navbharattimes.indiatimes.com/thoughts-platform/sunday-nbt/special-story/a-new-book-bomb-during-this-election/articleshow/33664866.cms

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज सोमवार (14-04-2014) के "रस्में निभाने के लिए हैं" (चर्चा मंच-1582) पर भी है!
    बैशाखी और अम्बेदकर जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. प्रधानमंत्री मजबूर हैं इसका अंदेशा तो सारी जनता को था ही। पर 10 जनपथ ने तो उन्हे कठपुतली ही बना दिया।

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