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सोमवार, 7 अप्रैल 2014

कोई गूंगा किसी बहरे अंधे को—पथिकअनजाना-575 वीं पोस्ट




कोई गूंगा किसी बहरे अंधे कोपथिकअनजाना-575 वीं पोस्ट
 http://pathic64.blogspot.com
समझे नही क्यों गायें प्रभुवंदना गीत को किस आधार पर हम
समझे नही क्यों ध्याये अपने होश धन वक्त गवायें चढ नई रीति
विक्रेता भले ही बदले शांति तो हर युग में हर वर्ष बिकती आई हैं
रहते अशांत खुद ग्राहकों की खोज में वे दब जाते नित नये ढौग
मानों गिनते गटर किनारे हो खडे पहुचे कितने भीतर वे भोले भाले
देखा शांत कई चेहरा गम सबको किसी किसी अभाव का हैं
बेचने वाला भी अशांत खरीदने वाला भी बिकने वाला भी अशांत
लगता मुझे मानो कोई गूंगा किसी बहरे अंधे को राह बता रहा हैं
पथिक अनजाना



1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (08-04-2014) को "सबसे है ज्‍यादा मोहब्‍बत" (चर्चा मंच-1576) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    श्रीराम नवमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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