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बुधवार, 21 अगस्त 2013

श्रीमदभगवत गीता भावार्थ:दूसरा अध्याय श्लोक संख्या ( २ ३ -४ ५ )

श्रीमदभगवत गीता भावार्थ:दूसरा अध्याय 

श्लोक संख्या ( २ ३  -४ ५ ) 

( २ ३  -४ ५ )शश्त्र  इस आत्मा को काट नहीं सकते ,अग्नि इसको जला नहीं सकती। जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती ;क्योंकि आत्मा अछेद्य ,अ-दाह्य और अशोष्य है। आत्मा नित्य ,सर्वगत ,अचल और सनातन है। 

कई चीज़ों की हमारे जीवन में बड़ी एहमियत है लेकिन कई बार यही चीज़ें काल भी बन जातीं हैं जैसे जल ,अग्नि ,शश्त्र आदि। जो चीज़ काटी जा सकती है इनसे नष्ट हो सकती है वह पदार्थ ही हो सकती है। आत्मा की सच्चाई यह है जहां तक दुनिया के शश्त्र नाभिकीय मिसायल भी पहुँच नहीं सकते जिसे बींध नहीं सकते वह आत्मा है। आत्मा अ -पदार्थ है। चैतन्य ऊर्जा है।शरीर को चलाने  वाली ब्रह्म शक्ति शक्ति है। चालक है इस शरीर का यह शरीर तो उसकी गाड़ी  है।  आँखें शरीर को हैं ,देखती आत्मा है। कान शरीर को हैं ,सुनती आत्मा है। कई लोग कह सकते हैं जब ऐसा है ,आत्मा अभेद्य है फिर पाप पुण्य स्वर्ग नरक की भोगना का क्या मतलब है ?

उत्तर यह है जीवात्मा पर जो लागू होता है वह उसके शुद्ध स्वरूप पर (जब वह शरीर से अलग हो जाती है )पर लागू नहीं होता है। आत्मा सांसारिक चीज़ों की पकड़  से एक दम बाहर है। 

भगवान कह रहें हैं आत्मा जैसा है वैसा का वैसा ही रहता है। दुनिया की कोई मिसायल ब्रह्माश्त्र मिसायल या कोई और अंतर -महाद्वीपीय मिसायल इसे भेद नहीं सकता। यह आत्मा नित्य है सर्वत्र है। घर (शरीर )के अन्दर का स्पेस अलग है परन्तु यह आत्मा चलायमान नहीं है। जो अचल है वही आत्म तत्व है। सन्देश है :जब भी ध्यान में बैठो तो सोचो हम अ -शरीरी हैं। बॉडी लेस हैं। हमारे पास न तो कोई शरीर हैं और न इन्द्रियाँ हैं। धीरे धीरे वह स्थिति आ जायेगी जब आप  अशरीरी हो जायेंगे। इन्द्रियों से उपराम हो जायेंगे। परे चले जायेंगे इन्द्रियों से । जब आप योग में बैठते हैं तब कई कहते हैं :मन भाग रहा है। अब ये किसे पता चल रहा है कि मन भाग रहा है बस वही आत्मा है। जो मन को भागते देख रही /रहा है।इसी पर एकाग्र रहो। जो आदि और अंत से रहित है सनातन है वही आत्मा है। आत्मा सर्व व्यापी है और स्थिर रहने वाला है। सब जगह हम ही हम हैं। हमारी ही व्याप्ति है। इसीलिए कहा गया है आत्मा सो परमात्मा। 

(२५ )यह आत्मा अव्यक्त ,अ -चिन्त्य और निर्विकार कहा जाता है। अत :आत्मा को ऐसा जानकार हे अर्जुन तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। 

यह आत्मा ऐसा है इसे हम व्यक्त नहीं कर सकते। जहां तक पूछा जाएगा कहाँ है आत्मा तो आप शरीर के किसी अंग पर ही हाथ रखके बतायेंगे।किस चीज़ को कहोगे ये "मैं हूँ "?जैसे कोई अपने  प्रेम को किसी लेब में सिद्ध नहीं कर सकता क्योंकि प्रेम अ -पदार्थ है। अव्यक्त है आत्मा की तरह। आत्मा तो विकार रहित है शुद्ध ,बुद्ध, निर्मल। विकार का मतलब होता है दुष्टता ,बुराई केवल मन के स्तर तक रहती है बुद्धि के स्तर तक आती है। जैसे आंधी तूफ़ान आने पर धूल और धूल का बबूला ऊपर उठकर  सूर्य को ढक तो लेते हैं लेकिन धूल सूर्य का स्पर्श नहीं कर सकती। आत्मा परमात्मा का स्वरूप एक है एक बार उसे जान लेने के बाद नैराश्य खत्म हो जाता है। आत्मा सदैव ही अकर्ता की स्थिति में रहता है ब्रह्म की शक्ति ही उससे काम करवाती है। 

(२६ -२७ )इन दोनों श्लोकों में भगवान अर्जुन के लेवल पर आकर बात कर रहें हैं :हे महाबाहो ,यदि तुम शरीर में रहने वाले जीवात्मा को नित्य पैदा होने वाला तथा मरने वाला भी मानो ,तो भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए ;क्योंकि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है। अत :जो अटल है ,उसके विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। 

मृत्यु की निश्चितता से किसी भी जीव की अनावश्यक ह्त्या ,अन्याय -भरे युद्ध ,यहाँ तक कि आत्म ह्त्या का औचित्य भी सिद्ध नहीं होता या किया जा सकता है।

हम आत्मा ईश्वर के वंश(अंश ) हैं वहां नैराश्य कैसा। चिंता भय और विषाद के हम पात्र नहीं हैं। वह जो तारा निश्चित है अटल है वह तू है। 

(२ ८ )हे अर्जुन सभी प्राणि  जन्म से पहले अ -प्रकट थे और मृत्यु के बाद फिर अ -प्रकट हो जायेंगे ,अव्यक्त हो जायेंगे।सभी प्राणि केवल जन्म और मृत्यु के बीच में  प्रकट (साक्षात )दीखते  हैं। गोचर होते हैं दृश्य जगत में आते हैं  फिर इसमें शोक करने की क्या बात है।

जो पानी के बुलबुले की तरह प्रकट हो रहे हैं सभी अव्यक्त की तरफ जा रहें हैं। मरने के बाद भी ये अव्यक्त हो जायेंगे। अल्प काल के लिए दिखाई देने वाले इन शरीरों के लिए शोक क्या करना।हर चीज़ यहाँ पर नदी की धारा की तरह बहती ही जा रही है। धरती और बादल की दोस्ती कैसे हो सकती है। जबकि आत्मा अडोल है स्थिर है। 

( २९ )कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है ,कोई इसका आश्चर्य की तरह वर्रण करता है ,कोई इसे आश्चर्य की तरह सुनता है और कोई इसके बारे में सुनकर भी नहीं समझ पाता। 

यह आत्म तत्व बड़ा गहन है। जो आपने नहीं देखा है वही आश्चर्य है.नियाग्रा फाल मान लीजिये आपने नहीं देखा देखते तो आश्चर्य होता। मान लीजिये -एक गुरु ने ,टीचर ने शिष्य को एक चपत लगा दी कसके फिर पूछा  -दर्द हुआ शिष्य बोला हाँ हुआ। न होता तो आश्चर्य होता। जीवन से विचित्र और कोई चीज़ नहीं होती। अपने अंत में आकाश निर्लिप्त है ,आत्मा की तरह जब लिप्त होता है तो धूल मिट्टी ,आंधी तूफ़ान ,काले बादल दिखलाई देते हैं।   

( ३ ० )हे अर्जुन सबके शरीर में रहने वाला यह आत्मा सदा अवध्य है,इसलिए किसी भी प्राणि के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। 

इस श्लोक में आत्म ज्ञान का चिंतन भगवान करवाते हैं। मनुष्य की ही बात नहीं है प्राणि मात्र के अन्दर जो जीवात्मा रहता है उसका कत्ल नहीं हो सकता है मर्डर नहीं हो सकता है यह जो शरीरी है (जीवात्मा है )इसका कोई वध नहीं कर सकता है।इस बात को जब मन में दृढ कर लोगे तो आखिर में यमराज को भी यही कहोगे -हमें तेरा कोई भय नहीं है बोलो कहाँ चलना है। फिर यमराज के लिए भी ले जाने के लिए भी कुछ नहीं बचता है।   

भाव यहाँ यह है कर्म की निष्ठा के द्वारा ही व्यक्ति संपन्न सम्पूर्ण बन सकता है। कर्म ही उसका धर्म है। 

श्रीमदभगवत  गीता श्लोक ३१ और उससे आगे 

(३ १ )और अपने स्वधर्म की दृष्टि से भी तुम्हें अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होना चाहिए ,क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्म नहीं है। 

वास्तव में जो हमारा सनातन धर्म है वह वर्णाश्रम आधारित रहा है। बेशक इस पर जाति भेद के आरोप ,आक्षेप भी लगे.लेकिन जाति और नस्ल तो हर जीव और वनस्पति की होती है पशु पक्षियों की भी प्रजातियाँ और जातियां हैं। हर चीज़ जिसमें भी गति होती है उसकी जातियां मौजूद हैं। इस व्यवस्था के तहत जिनका लक्ष्य केवल ज्ञान था उन्हें ब्राह्मण कहा गया ,जिनका लक्ष्य केवल धन कमाना था ,उन्हें वैश्य कहा गया ,जिनमें चातुर्य बुद्धि बल नहीं था उन्हें शूद्र कहा गया। कहा कोई बात नहीं तुम सेवा करो। भगवान  अर्जुन को जगा रहे हैं। हे अर्जुन तुम क्षत्री हो और अगर तुम अपने धर्म को भी देखो तो तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिए। एक क्षत्रिय के लिए देश रक्षा ,धर्म रक्षा से बड़ा कोई और धर्म नहीं है। तू देख तू कौन है। ज़ाहिर है अर्जुन की जगह कोई ब्राह्मण होता तो भगवाना ऐसा नहीं कहते सोचते जाने दो कोई बात नहीं। नहीं लड़ता तो न सही। कहते तुम ब्राह्मण हो जाओ तुम ज्ञान अर्जन ही करो। जन्म जन्म से ही अर्जुन तू युद्ध के लिए बना है कोई एक जन्म की बात नहीं है। क्षत्री होता ही धर्म रक्षार्थ है। तुम्हारे सामने तो अपने आप युद्ध आकर खडा हो गया है। तुम उससे अब भागो मत। आज हर व्यक्ति युद्ध ही तो कर रहा है घर में दफ्तर में। घर घर में महाभारत हो रहा है सारी  दुनिया कुरुक्षेत्र हो गई है। सब जगह मनुष्य हालात से तो लड़ रहा है। 

ये चारों स्वभाव ,चारों वृत्तियाँ हर व्यक्ति में निवास करती हैं। युद्ध भी तुम्हारे लिए तो धर्म युद्ध है। धर्म युद्ध से बड़ा कोई और साधन तुम्हारे कल्याण के लिए नहीं हो सकता है। इसलिए परिणाम जो भी हो तुम युद्ध करो। कर्म करो और अपने स्वधर्म को भी तुम देखो। तुम्हें ज़रा भी भय भीत और निराश नहीं होना चाहिए। हर व्यक्ति अपनी अपनी क्षमता के साथ समाज सेवा कर रहा है आजीविका तो सबको चाहिए। तुम भी धर्म युद्ध करो। 

(३ २ )हे पृथानन्दन ,अपने आप प्राप्त हुआ युद्ध स्वर्ग के खुले द्वार जैसा है ,जो सौभाग्य शाली क्षत्रियों को ही प्राप्त होता है.वरना सब अपने अपने स्वार्थ के लिए लड़ते हैं। तुम तो जन कल्याण के लिए लड़ रहे हो। अपने कर्तव्य आगे आके करने चाहिए। जो भी चीज़, परिश्तिथि सामने से आई है उसका मुकाबला करना चाहिए। उसी स्थिति में से व्यक्ति के कल्याण का दरवाज़ा खुलेगा। बुरी या अच्छी कैसी भी परिस्थिति हो व्यक्ति को उसे छोड़कर भागना नहीं चाहिए। फिर इस तरह का युद्ध भाग्यवान क्षत्री ही प्राप्त करते हैं जो अपने आप तुम्हारी झोली में आ गिरा है। 

(३ ३ )और यदि तुम इस धर्म युद्ध को नहीं करोगे ,तो अपने स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त करोगे। व्यक्ति अपने स्वधर्म से पीछे हटेगा तो पाप का भागी बनेगा। उसका स्वधर्म तो नष्ट होगा ही अपयश भी मिलेगा। अगर हम इंसानियत को नहीं जी रहे हैं कर्तव्य को छोड़कर भाग रहे हैं ,भगवान के सम्मुख होकर सेवा नहीं कर रहे हैं ,संसार की तरफ भागे जा रहे हैं  तो यही जीवन का सबसे बड़ा पाप है। अन्दर का अन्धेरा ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है। उससे लड़ने के लिए ज्ञान की तलवार चाहिए। स्वधर्म और कीर्ति खोकर तू पाप का भागी बनेगा। 

(३ ४ )तथा सब लोग बहुत दिनों तक तुम्हारी अपकीर्ति की चर्चा करेंगे। सम्मानित व्यक्ति के लिए अपमान मृत्यु से भी बढ़कर है। क्षत्री का गहना अहंकार है भगवान् इस श्लोक में अर्जुन के अहंकार को और बढ़ा रहे हैं। ये तू जो कायरों की तरह भागने की बात कर रहा है जानता है सभी ये कहेंगे अर्जुन पहले से ही कायर था। कायर का ही उसका स्वरूप था। मर जाएगा युद्ध में तो तुम्हें यश मिलेगा भागेगा तो अपयश का भागी बनेगा। तुम्हारी अपकीर्ति की लोग देर तक चर्चा करते रहेंगे जो मरने से भी बदतर है। 

(३ ५ )जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित था उनकी ही नजरों में तू अत्यंत लघुता को प्राप्त हो जाएगा। कहाँ तू उनकी दृष्टि  में एक पराक्रमी ,महावीर था ,अब वही तुझे रणछोर भगोड़ा कहेंगे। महारथी लोग तुम्हें डरकर युद्ध से भागा हुआ मानेंगे ,जिनके लिए तुम बहुत माननीय हो उनकी दृष्टि से बहुत नीचे गिर जाओगे। 

श्रीमद भगवत गीता श्लोक ३६ वां और उससे आगे 

(३ ६ )तुम्हारे वैरी लोग तुम्हारे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुम्हारी बहुत बुराई करेंगे।तुम्हारे लिए इससे दुखदाई और क्या होगा। 

भगवान  राम ने वाल्मीकि  रामायण में कहा है -जनता जो कह रही है लोक जो कह रहा है मैं उसकी चिंता करता हूँ आज के नेताओं की और बात है। लोग यही मानेंगे तुमको उर्वशी ने जो शाप दे दिया था तुम उसकी वजह से ही नपुंसक हो गए (सन्दर्भ है उर्वशी अर्जुन पर मोहित हो उसके शयन कक्ष में चली आई थी -अर्जुन ने कहा -माँ तुम क्यों चली आईं  मुझे बुला लिया होता। उर्वशी ने कहा अप्सरा किसी की भी माँ नहीं होती। अर्जुन ने कहा तुम तो हमारे पूर्वजों के निकट आई हो इसलिए हमारी तो माँ ही हो गईं। उर्वशी ने अपमानित हो अर्जुन को शाप दिया -जा तू नपुंसक हो जा। नारद  आदि देवों  ने उस शाप की अवधि को कम करवाके एक वर्ष का करवा दिया था। )तुम्हारे निंदक तुम्हारे दुश्मन आदि सब मिलकर बहुत सी न बोलने वाली भी बातें कहेंगे उस अपमान और कष्ट से बढ़कर तुम्हारे लिए कुछ भी तो न होगा अर्जुन। 

(३ ७ )हे अर्जुन अगर तू मारा गया तो स्वर्ग प्राप्त करेगा। और विजयी होकर तू सारे साम्राज्य सकल धरा का सुख भोगेगा। इसलिए हे कौन्तेय तुम निश्चय करके युद्ध के लिए खड़े हो जाओ। 

वो लोग तो निश्चित तौर पर हारेंगे ही क्योंकि अधर्म के साथ है। इसलिए तू धर्म युद्ध के लिए खड़ा  हो जा। तू क्षत्राणी का पुत्र है जो इसी दिन के लिए पुत्र पैदा करती है कि एक दिन वह अन्याय के सामने  खड़ा होगा। अधर्म को हटाएगा। धर्म की रक्षार्थ खड़ा होगा। इसलिए भगवान् अर्जुन का अहंकार लगातार  जगा रहे हैं। 

(३ ८ )सुख- दुःख, लाभ -हानि ,जीत -हार की चिंता न करके मनुष्य को अपनी शक्ति के अनुसार कर्तव्य -कर्म करना चाहिए। ऐसे भाव से कर्म करने पर मनुष्य को पाप नहीं लगता है। 

अर्जुन पाप से बहुत डरते थे इसीलिए भगवान् पाप के प्रति उनके दुःख को कम करते हुए कह रहे हैं -अगर तुम सुख और दुःख दोनों को एक समान कर दो तो तुम्हें पाप नहीं लगेगा। जितने भी सांसारिक सुख हैं उनको एक तरफ रख दो। और दुःख से भी मत घबराओ। यदि व्यक्ति सुख और दुःख को बराबर समझ ले तो युद्ध में वह किसी भी पाप को प्राप्त नहीं होता है। जब तक वह किसी नुक्सान से घबराता रहेगा,लाभ  हानि के चक्कर में पड़ा रहेगा  तब तक वह पाप  और पुण्य से बच  नहीं पायेगा। इसलिए हे अर्जुन पुण्य और पाप ,लाभ - हानि ,जय -पराजय दोनों का मोह छोड़ना पड़ेगा। फिर पाप नहीं लगेगा। सुख और दुःख मन को विचलित करने वाले हैं। द्वंद्व पैदा करते हैं। जल में चीनी मिलाने से उसकी शुद्धता नष्ट हो जाती है फिर न तो उससे प्यास बुझा सकते हो न तन को शुद्ध कर सकते हो। 

( ३ ९ )हे पार्थ ,मैं ने सांख्य  मत का यह ज्ञान तुमसे कहा ,अब कर्म योग का विषय सुनो ,जिस ज्ञान से युक्त होकर तुम कर्म के बंधन से मुक्त हो जाओगे। 

अब यहाँ से आगे भगवान अर्जुन को कर्म योग के बारे में बताते हैं।इस ज्ञान  के द्वारा तू बड़े से बड़े बंधन से ऊपर उठ जाएगा ,उसे नष्ट कर देगा। 

(४ ० )कर्म योग में आरम्भ अर्थात बीज का नाश ही नहीं होता तथा उलटा फल भी नहीं मिलता है। इस निष्काम कर्मयोग रुपी धर्म का थोड़ा सा अभ्यास भी (जन्म -मरणरुपी )महान भय से रक्षा करता है। 

सन्देश यहाँ यह है जब अच्छे मार्ग पे चलने की शुरुआत  हो जाती है उसका कभी भी उलटा परिणाम नहीं होता है।यह अच्छाई का मार्ग इतना विलक्षण है यदि थोड़ा सा भी व्यक्ति इसका आश्रय कर ले तो यह महान भय और नैराश्य से मनुष्य की रक्षा कर लेता है। इस कर्म योग के मार्ग पे चलना शुरू कर दिया तो उसका  फिर कभी नाश नहीं होगा। परमात्मा की तरफ जाने वाले किसी भी मार्ग पर आरम्भ का अंत नहीं होता है। भगवान् की तरफ चलने की जिसने शुरुआत कर दी उस शुरुआत का कभी  भी अंत नहीं होगा। अध्यात्म का प्रारम्भ व्यक्ति की हर प्रकार की समस्याओं का अंत कर देता है। 

(४ १ )हे अर्जुन ,कर्म योगी केवल ईश्वर प्राप्ति का ही दृढ़  निश्चय करता है ,परन्तु सकाम मनुष्यों की इच्छाएं अनेक और अनंत होती हैं। 

(४२ )हे पार्थ सकाम अविवेकी जन ,जिन्हें वेद  की मधुर संगीतमयी वाणी से प्रेम है ,(वेद को यथार्थ रूप से नहीं समझने के कारण )ऐसा समझते हैं कि वेद में भोगों के सिवाय और कुछ है ही नहीं। 

(४ ३ )वे समझते हैं वेद कामनाओं से युक्त ,स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले ,भोग और धन को प्राप्त कराने  वाले अनेक धार्मिक संस्कारों को ही बाताते हैं,जो पुनर्जन्म रुपी कर्म फल को देने वाले होते हैं। 

(४४ )भोग और ऐश्वर्य ने जिनका चित्त हर लिया है ,ऐसे व्यक्ति के अंत :करण  में भगवत प्राप्ति का दृढ़  निश्चय नहीं होता है और वे परमात्मा का ध्यान नहीं कर सकते। 

( ४ ५ )हे अर्जुन ,वेदों (के कर्म काण्ड )का विषय प्रकृति के तीन गुणों से सम्बंधित है ; तुम त्रिगुणातीत ,निर्द्वन्द्व ,परमात्मा में स्थित ,योगक्षेम न चाहने वाले और आत्मपरायण बनो। 

इस कर्म योग में संकल्प का बड़ा महत्व है जो ठान लिया सो ठान लिया। एन्द्रिक भोगों ने जिनकी बुद्धि का अपहरण कर लिया है जिनके मन में भोग की कामना है वह भोग वाली वस्तुओं को ढूंढ ही लेते हैं। उनकी बुद्धि निश्चयात्मक नहीं होती है। वेद वाक्यों में वे रूचि तो रखते हैं लेकिन उन्हीं श्लोकों में उनकी रूचि होती है जो भोग का रास्ता बतलाते हैं। यहाँ लगता है गीता वेदों के खिलाफ है लेकिन ऐसा है नहीं। भोग ऐसे व्यक्तियों की बुद्धि हर लेते हैं। अध्यात्म के मार्ग में तो अपनी बुद्धि बस एक परमात्मा में जोड़नी होती है। भोगवादी लोगों की बुद्धि अनंत शाखाओं वाली होती है। वे तो तप भी इसीलिए करते हैं कि तप भंग करने के लिए अप्सराएं आयेंगी। 

वेद तीनों गुणों की ही बात कर रहे हैं वहीँ तक सीमित हैं। मोक्ष की प्राप्ति तब होगी जब हम इन तीनों गुणों से ऊपर उठेंगे। हे अर्जुन तू इन तीनों गुणों से ऊपर  उठ निर्द्वन्द्व हो जा। जो नित्य परमात्मा है उसमें स्थिर हो जा। वेदों को तुम छोड़ो। तुम्हारी ज़रुरत मैं पूरी करूंगा और उस ज़रुरत की चीज़ की हिफाज़त (योगक्षेम )भी करूंगा। तू अपनी तरफ से योग क्षेम को चाहने वाला न बन। 

ॐ शान्ति। 

सन्दर्भ -सामिग्री :योगी आनंद जी का स्काइप पे क्लास रूम (नार्थ कैरोलिना ,१४ अगस्त २०१ ३ )

हरि ॐ....अनन्त मंगल शुभ कामनाओं के साथ....

आत्मीय मित्रों.......! आज के पावन दिन पर राष्ट्र, धर्म, एवं प्रतिदिन कटती हुई गायों की रक्षा तथा असहाय माताओं एवं बहनों के आँचल की सुरक्षा के लिये तन, मन, धन से हम सभी संकल्प-बद्ध हों.....तभी हम सभी के जीवन में, हमारे अस्तित्व की रक्षा की सुरक्षा तथा वास्तविक रुप में रक्षा-बन्धन की भी सार्थकता होगी । हरि ॐ



यत्र गीता विचारश्च, पठनम्‌ पाठनम्‌ श्रुतम्‌ ।
तत्राहम्‌ निश्चितम्‌ पृथ्वी, निवसामि सदैव हि ॥

भगवान कहते हैं कि हे पृथ्वी ! जहाँ पर भी मानव जीवन को पूर्णता प्रदान करने वाले, पवित्रतम शास्त्र, भगवत गीता पर विचार किया जाता है, जहाँ पर भी भगवत गीता का श्रद्धा-भक्ति से पाठ किया जाता है, जहाँ पर भी निःस्वार्थ-भाव-युक्त, सच्चे मन से भगवत गीता पढ़ायी जाती है, जहाँ पर भी एकाग्रता एवं तन्मयता के साथ भगवत गीता का श्रवण किया जाता है.....वहीं पर मैं निरन्तर निवास करता हूँ ।




Shri Gopal Jayshankar Prasad Pandey (Yogi Anand Ji/ Swami Ji)
Yogi Anand Ji  joined The Hindu Temple as Hindu Minister/Swami Ji in December 2012 to serve as the spiritual and religious leader. While the priests at the temple perform the ritualistic aspects of Hinduism, including the offerings and services to the deities, swamis offer guidance and interpretation on the fundamental principles of Hinduism as articulated in the central holy text of the Bhagwat Geeta and the other Hindu religious texts. Through these teachings, Hindu worshippers learn how to apply the core tenants of the Hindu faith to their everyday life. In addition to imparting knowledge of the Hindu texts, which prepares a Hindu worshipper’s intellect to attain enlightenment, swamis also share in their knowledge of Yoga, Pranayam and Meditation, all of which prepares the worshipper’s body and mind for spiritual development
Swami Ji has been educated in India to spread the knowledge of the Bhagwat Geeta, Yoga, Pranayam (breathing exercises) and Meditation. A child prodigy, Swami Ji had mastered Sanskrit (the sacred language of Hindu texts) as well as the Bhagwat Geeta by the tender age of 4.  By the age of 15, through self-study, Swami JI was also well versed in the more esoteric Hindu scriptures, including the Vedas, Upanishads, and Puranas.  He has been serving as a full-time swami since 2000.  To serve his spiritual mission of spreading knowledge of the Hindu scriptures, Swami Ji has traveled from his home country, India, to the United States, United Kingdom, Australia, Canada, Kenya, Uganda, Tanzania, Mauritius, New Zealand, Fiji, Hong Kong and other countries across the globe.  In addition to his teachings, Swami Ji has founded the “Mangalaya Gita Vidyapeeth” estabilished in 1997 and is administered by Bhagwat Geeta Parivar Trust for youths through which he runs a free school for children in Ghazipur, India and distributes food, clothes, medicines, and supplies among the needy.  Hindu organizations across the globe seek the blessing of his spiritual discourses. Swami Ji was trained by well known Gurus such as Vidyanand Giri Ji Maharaj, Maharaj Vishnu Devanand Ji and Acharya JinChandar Suri Ji Maharaj. Swami Ji attained mastery of Yoga, Pranayam and Meditation from Kapil Muni Ji Maharaj in Rudra Prayag and Mangal Yoga, Founder, President, Universal Donor and Director at “Akhanda Yoga Dham Trust” in Rishikesh.
Fluent in :  Hindi, Gujarati, Sanskrit and Bhojpuri

Working Knowledge : Hindi, Gujarati and Sanskrit
Other qualifications : Spiritual Healing Sessions
Cell Phone: 734-355-9157
Skype: Yogianand009

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