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बुधवार, 28 अगस्त 2013

श्रीमदभगवतगीता दूसरा अध्याय (श्लोक ५७ -६ ० )

श्रीमदभगवतगीता दूसरा अध्याय (श्लोक ५७ -६ ० )

(५ ७ )जिसे किसी भी वस्तु में आसक्ति न हो ,जो शुभ को प्राप्त कर प्रसन्न न हो और अशुभ से द्वेष न करे ,उसकी बुद्धि स्थिर है। 

(५८ )जब साधक सब ओर  से अपनी इन्द्रियों को विषयों से इस तरह से हटा ले जैसे कछुआ (कछुआ विपत्ति के समय अपनी रक्षा के लिए )अपने अंगों को समेट लेता है ,तब उसकी बुद्धि स्थिर समझनी चाहिए। 

( ५९ )इन्द्रियों को विषयों से हटाने वाले मनुष्य से विषयों की इच्छा तो हट भी जाती है ,परन्तु विषयों की आसक्ति दूर नहीं होती। परमात्मा के स्वरूप को भलीभाँती समझकर स्थितप्रज्ञ मनुष्य (विषयों की ) आसक्ति से भी दूर हो जाता है। 

(६० )हे कुंती पुत्र ,कुंती नंदन ,संयम का प्रयत्न करते हुए ग्यानी मनुष्य के मन को भी चंचल इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती हैं। 

 व्याख्या विस्तार :

भगवान् कहते हैं उस व्यक्ति की बुद्धि परमात्मा में प्रतिष्ठित हो चुकी है जो किसी भी समय शुभ -अशुभ ,अच्छाई -बुराई से प्रभावित नहीं होता है यह स्थिति कैसे आयेगी भगवान् ने आगे जाके बताया है गीता में। 

हमारे जीवन को भी ख़तरा होता जब हम कुछ खराब परिस्थिति को जीने लगते हैं। मुसीबत आने पर आदमी बाहर से मदद ले  लेता है मुसीबत तो चार दिन की होती है चली जाती है वैसे ही जैसे आती है लेकिन मदद देने वाले का एहसान देर तक बना रह जाता  है इसलिए जीवन में अनुकूलता प्रति कूलता क्षणिक हैं दोनों ही अपना प्रभाव न छोड़ें हमारी हिम्मत को न तोड़े। जैसे मेला होता है चार दिन का लगता है उजड़ जाता है वैसे ही प्रतिकूलताएं भी चली जाती हैं। हमारे जीवन में अनुकूलता के प्रति अनुराग न हो प्रति- कूलता के प्रति विद्वेष न हो। जब तक हम इनसे असरग्रस्त होते हैं समझो हम संसार में हैं इनसे ऊपर उठने पर अध्यात्म शुरू होता है। 

जीवन का विज्ञान बता दिया है यहाँ परमात्मा ने :जैसे कछुआ अपने जीवन को खतरा देखकर अपने अंगों को हर तरफ से बटोर लेता है नियंत्रित कर लेता है इसी तरह वही व्यक्ति साधक है जो अपनी इन्द्रियों के विषयों को जब चाहे समेट  ले। संसार में इन्द्रियों के विषयों से वास्ता तो पड़ेगा लेकिन व्यक्ति को संयमित रहना पड़ता है जैसे स्वादिष्ट भोजन आने पर यह ध्यान ज़रूर रहे कितना भोजन करना है। व्यक्ति खाता ही न चला जाए पेटू बन। और बाद में पीड़ा से पछताए। कछुआ संयम का प्रतीक है अध्यात्म  के मार्ग में आ रहे हो तो स्व -अनुशाशन होना चाहिए। हमारी इन्द्रियाँ हमारे नियंत्रण में होनी चाहिए। जब कोई व्यक्ति ऐसा कर लेता तब समझो उसकी प्रज्ञा भगवान् में लीन हो गई है। 

मौन में ,उपवास में लोग बाहर से तो इन्द्रियों के विषयों को छोड़ देते हैं लेकिन अन्दर से पकड़े  रहते हैं। अन्दर से भोग के विषयों से रूचि नहीं जाती है। विषयों को बाहर से छोड़ने लेकिन अन्दर से उनका चिंतन करने का कोई मतलब नहीं है। व्रत के दिन कोई खाद्य पदार्थ आपको न लुभाए ललचाये क्या ऐसा होता है ?आहार केवल जीभ का नहीं होता हर इन्द्रिय का अपना आहार है। जैसे कानों का आहर संगीत है। जिभ्या को स्वाद और स्वादिष्ट पदार्थ। 

लेकिन जो व्यक्ति में भगवान् में लग जाता है उसका विषयों के प्रति भी राग  हट जाता है।  उसने यदि परमात्मा का अध्यात्म का रस चख लिया है तो उसे फिर  संसार के सब विषय फीके लगने लगते हैं। जिसे सांसारिक वस्तुओं में स्वाद आ रहा है इसका मतलब है उसने अभी इससे बड़ा स्वाद चखा ही नहीं है। 

जब तक संसार के विषय भोगों से आसक्ति नहीं मिटती  है इन्द्रियाँ उन्हें फिर भी खींच लेती हैं। हमारे मन में उनका जो महत्व बैठा हुआ है उसे छोड़ने से पहले कुछ नहीं होगा। मन से रूचि हटे ,अन्दर से हटे फिर बाहर से भी हट जायेगी। पुरुषार्थ करने के बाद भी बलवान इन्द्रियाँ व्यक्ति के मन का अपहरण कर लेती हैं।

विश्वामित्र  की आसक्ति  अन्दर से नहीं मिटी  थी इसलिए एक मेनका ने उन्हें पकड़ लिया था अर्जुन की मिट गई थी इसलिए स्वर्ग की भी सबसे सुन्दर अप्सरा उनपे मोहित होकर जब उनके कक्ष में चली आई थी अर्जुन ने उसे माँ के संबोधन से पुकारा था। अगर हम मन से ज्ञान द्वारा पके नहीं है मन से कच्चे हैं तो सब बेकार है। अर्जुन के संग संसार नहीं था अध्यात्म था। भगवान् थे। 

पकड़ने का काम आसक्ति करती है। आदमी पिस्टल या बन्दूक से नहीं मरता है। मारने का काम गोली करती है वह भी तब जब गोली में बारूद भी होगा। आसक्ति को मन बुद्धि और इन्द्रियाँ तीनों पकड़ती हैं। तीनों को इससे आज़ादी मिले। तो जानो व्यक्ति अध्यात्म की ओर अग्रसर है।  

ॐ शान्ति। 

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