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रविवार, 25 अगस्त 2013

तिमिर गया रवि देखते ,कुमति गई गुरु ज्ञान , सुमति गई अति लोभ ते ,भक्ति गई अभिमान।

(१ )पच्छ पच्छ के कारने ,सब जग रहा भुलान ,

निरपछ  होके  हरि भजै ,सोई संत सुजान। 

लोग विभिन धर्म संप्रदाय मत मतान्तरों में  बंटे  हुए है। खुद को सेकुलर शेष को साम्प्रदायिक बतला रहे हैं। इसी लिए जगत भटकाव की स्थिति में है। हर कोई अपने मत को श्रेष्ठ बतलाने में लगा हुआ  है.जो संसार से निरपेक्ष रहते सभी मनान्तरों ,धार्मिक समूहों  से समान  दूरी रखते हुए एक ही अल्लाह एक ही ईश्वर की भक्ति में लीन  रहता है एक ही की याद हृदय में बसाए रहता है  वही सच्चा संत है। आप संसार में हैं संसार आपके अन्दर नहीं है जो यह तथ्य जान लेता है वही सच्चा भगत है।

संत जानता है और अच्छी तरह से मानता है सब आत्माओं में एक ही परमात्मा का वास  है। सब उसी के प्रकाश से आलोकित हैं। वह सब में एक ही ईश्वर का प्रकाश देखता है। सभी मत मतान्तर उसे प्राप्त करने की ही सीढ़िया  हैं। सब पायों को मिलाके ही एक सीढ़ी बनी है। अ-द्वैत भाव हैं यहाँ सब जीवों के प्रति। . एक से ही अनेक हैं।

(२ )गुरु को कीजे बन्दगी ,कोटि कोटि परनाम ,

     कीट न जाने भृंग को ,गुरु कर ले आप समान।

गुरु को ही लाखों लाख प्रणाम कीजिये उसी का ही आदर सम्मान कीजिये।जैसे कोई बर्र (ततैया ,भिड़ )किसी कृमि  को अपने छत्ते  में ले जाती है और वहां से फिर दूसरी नवजात ही निकलती है वैसे ही गुरु एक साधारण शिष्य को भी आप समान बना देते हैं।

गुरु को ही शीश नवाइये जो शिष्य को ईशवर प्राप्ति के मार्ग पे ले जाता है। प्राण पण  से उसकी प्रतिष्ठा करता है हर इमदाद करता है , उस अज्ञानी की ,ज्ञान प्राप्त कराता है। ज्ञान का तीसरा नेत्र खोलकर उसे आप समान बनाता है।

(३ )तिमिर गया रवि देखते ,कुमति गई गुरु ज्ञान ,

      सुमति गई अति लोभ ते ,भक्ति गई अभिमान। 

कबीर कहते हैं :सूरज के प्रकाश से ,सोजरे से अन्धकार मिट जाता है ,उजेरा उसका स्थान ले लेता वैसे ही गुरु ज्ञान से अज्ञान  नष्ट हो जाता है प्रज्ञा उसका स्थान ले लेती है। ज्ञान के निर्मल पात्र में  लोभ लालच खोट भर देता है। अहंकार भक्ति को नष्ट कर देता है।

दिल में पसरे अज्ञान अन्धकार को गुरु का ज्ञान हटा देता है जैसे सूर्य का प्रकाश आलम से इस कायनात से अन्धकार को हटा देता है। ठीक ऐसे ही मनुष्य की आवश्यकता से अधिक पाने की इच्छा मेधा बुद्धि को नष्ट कर देती है। आच्छादित कर लेती है जैसे सूरज को बादल ,अंधड़। व्यक्ति का अहंकार ऐसे ही भक्ति को प्रभु प्राप्ति को हमसे दूर ले जाता है।

(४ )गुरु धोबी ,शिष , कापड़ा ,साबुन सिरजन -हार ,

     सुरति सिला पर धोइए ,निकसे ज्योति अपार। 

गुरु धोबी  के समान है और शिष्य मैले कुचेले वस्त्रों के ,विकार ग्रस्त आत्मा के। और वह सृष्टि करता स्वयं लक्ष (लक्ष्य )का साबुन है। गुरु अपने ज्ञान से मेरे विचारों की खोट उतारे  इस खोट के स्रोत मन की सफाई करे  तभी मेरे हृदय में ज्ञान की उजास भरेगी।

जब गुरु श्रीमत का मन्त्र देता है -"मनमना- भव,मामेकं याद करो "उस एक ईश्वर का ही ध्यान करो।  और शिष्य उस मन्त्र का जप करता है उस एक परमात्मा की ही याद में निरंतर रहता है तब उसके हृदय की सारी  खाद निकल जाती है बुद्धि फिर से निर्मल पात्र बन जाती है सोलह आने खरी।मन गंगा हो जाता है। और शिष्य ईश्वर को प्राप्त हो जाता है।

(५ )गुरु बिन ज्ञान न उपजे ,गुरु बिन मिले न मोक्ष ,

      गुरु बिन लाखे न सत्य को ,गुरु बिन मिटे न दोष। 

गुरु की श्रीमत (निर्देश )के बिना ,गाइडेंस के बिना आध्यात्मिक ज्ञान को शिष्य प्राप्त नहीं होता है। न ही मनुष्य, जीवन-- मुक्ति को प्राप्त करता है (नष्टो मोहा होना ही जीवन मुक्ति है ,जीते जी मर जाना है इस संसार के लिए इस संसार से ,इस संसार में रहते हुए भी इसमें नहीं रहना है।इसके ऐश्वर्य सुख भोग से ऊपर उठ जाना है )

गुरु के बिना न तो सत्य दिखाई देता है न ही व्यक्ति की भ्रांतियां ,भ्रांत धारणाएं ,delusions ही दूर हो पाती  हैं।

गुरु का महिमा की गई है इस साखी में। इस भवसागर को पार करने के लिए। अध्यात्म की ऊंची सीढियां चढ़ने के लिए अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ने के लिए गुरु की ऊंगली निरंतर पकड़नी  पड़े है।
    

(६ )गुरु बे -चारा क्या करे ,सिखहिं माहीं चूक ,

भावे तों परमोधिये ,बांस बजाये फूंक।


अगर शिष्य कुपात्र है ,उसकी बुद्धि में कुछ ठहरता ही नहीं है ,उसकी बुद्धि का  पात्र ही  गंदा पड़ा  है.छेदों वाला

है।  तब गुरु भी क्या कर सकता है। जैसे  फंटे बांस की बांसरी नहीं बजती है उससे संगीत राग नहीं निकलता है

ऐसे दोषों से भरे शिष्य को बोध नहीं होता है।

शिष्य में निष्ठा ,साहस और विश्वास और धैर्य का होना भी ज़रूरी है। ईश्वर प्राप्ति का मार्ग तभी उसके लिए

खुलता है। तभी वह उस पर आगे बढ़ सकता है। बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता।

( ७ )एक शबद गुरु देव का ,टका अनंत विचार ,

      थके मुनि जन पंडिता ,वेद न पावे पार। 

सत  गुरु का हर वचन अमृत वाणी है ज्ञान वाणी है। ज्ञान का अपार कोष है। मुनि जन भी इसका पार न पा

सके। पंडित इसकी गहराई को न बूझ सके। वेदों को भी इसकी थाह न मिली।

गुरु कमल मुख से स्वयं ईश्वर  ही बोलते हैं। विनम्र साधक ही इस  रहस्य को  जान सकता है.ज्ञान और अहंकार से सने लोग इसे बूझ  नहीं सकते।वेद भी इसके बारे कोई ख़ास नहीं बता सके हैं। आध्यात्मिक अनुभव वेद  पुराण नहीं करा सकते। उसके लिए तो गुरु की ठौर ही आना पड़े।

(८)हरि किरपा तब ,जानिये दे मानव अवतार ,

    गुरु किरपा तब जानिये , मुक्त करे संसार। 

ईश्वर  की  अनुकम्पा से ही तुम्हें  यह मनुष्य योनी ,मनुष्य चोला मिला है। लेकिन गुरु किरपा ही तुम्हें जीवन

मुक्ति दिलवा सकती है।

ईश्वर का धन्यवाद करो तुम्हें यह मनुष्य तन मिला है उसकी आराधना  से अब तुम मोक्ष को प्राप्त हो सकते

हो।  लेकिन तुम अभी भी कर्म -बंध , जीवन बंधन में फंसे हो ,एक चोला छोड़ दूसरे  में


तुम अभी जाते हो उस सतगुरू की अनुकम्पा से ही तुम इस आवाजाही से मुक्त हो सकते हो।भवसागर से तर

सकते

हो।इस असार संसार का अति क्रमण कर सकते हो।

(९  )कबीरा खड़ा बज़ार में ,चाहे सबकी खैर ,

न काहू से दोस्ती ,न काहू से बैर। 

खुले बाज़ार में खड़ा ,बाजार की ताकतों के सामने खड़ा मैं सबका कल्याण चाहता हूँ। न मेरा यहाँ कोई  सगा सम्बन्धी हैं न बैरी। 

कबीर हिन्दू मुसलमान सब के थे और सब कबीर के थे। न वह मंदिर जाते थे इबादत के लिए न सजदे के लिए मस्जिद। वह तो धर्म के कर्म कांडी स्वरूप से ऊपर उठ चुके थे। इबादत उनके लिए भाव का भावना का द्वार था। वह सब मजहबी बहस मुबाहिसे से ऊपर थे। उन्हें लगा अपने सिद्धांतों को समझाने का उपयुक्त स्थान बाज़ार ही हो सकता ही जहां  सब सम्प्रदायों मजहबों के लोग आते जाते हैं। वह ताउम्र सत्य के ही अन्वेषक और प्रचारक रहे किसी धर्म या जाति  विशेष के नहीं। सही मायने में कबीर सेकुलर थे। सर्व धर्म समभावी। सर्व ग्राही भारतीय संस्कृति के पोषक और संवर्धक थे कबीर। 

(१ ०  )चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय ,

दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय। 

कबीर कहते हैं जो इस संसार रुपी चक्की के दो पाटों के बीच फंस गया उसकी फिर गति नहीं होती। मैं इस स्थिति का आकलन कर कई मर्तबा रो चुका हूँ। 

दो पुर का जीवन द्वंद्व से भरा है। सुख और दुःख ,हानि -लाभ मृत्यु जन्म ,सच और झूठ ,पाप और पुण्य ,प्रेम और घृणा ,गुण -अवगुण के बीच में जो फंस गया उस की नियति फिर उस अनाज की तरह हो जाती है जो चक्की के दो पाटों के बीच पिसता  है। केवल धुरी के नीचे ही  कुछ दाने बचते हैं। धुरी ही स्थिर रहती है। जो परमात्मा की तरह स्थिर बनी रहती है केवल उसके पास के कुछ  दाने ही पीसे  जाने से बचते हैं अर्थात जो प्रभु की शरण में आ जाता वही सद -गति को  जीवन मुक्ति को प्राप्त होता है शेष इस संसार चक्की में पिसते रहते हैं।

जो इन विपरीत ध्रुव वाली चीज़ों में सम  भाव बनाए रहता है वही जीवन में मुक्ति को प्राप्त कर आवागमन के चक्र से छूट  सकता है। 



ॐ शांति


SAKHIS OF GURU KABIR - members.shaw.ca

www.members.shaw.ca/kabirweb/sakhis.htm

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Posted: 23 Aug 2013 10:32 PM PDT




  

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