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मंगलवार, 27 अगस्त 2013

मुझ अनाम को

मुझ अनाम को तुमने दिये कितने नाम
कभी राघव कभी राम कभी कान्हा कभी शाम ।

सर्वव्यापी को किया बंदि पूजा घर में
मसजिद, गिरजाघर, गुरुद्वारे, मंदिर में ।
अपने मन के ही लिये किये सारे काम ।। कभी राघव

मुझ अकाय को दी काया और रूप।
द्विभुज, चतुर्भुज, चतुर्मुख, गजमुख ।
पहनाया पीतांबर,कभी व्याघ्र चाम ।। कभी राघव 

मुझ अजन्में को दिया जनम कितनी बार
जयंती भी मनाते रहे हो बार बार
मुझसे मिलने जाते रहे चार धाम।।  कभी राघव

मुझ अशरीरी को दिये शस्त्र भी सदा
कभी धनुष कभी बंसी कभी चक्र औ गदा 
मेरे बिन किये करवाये सारे काम ।। कभी राघव

शक्तिमान मुझको बनाया असहाय
कभी बालकृष्ण तो कभी बाल राम राय
झूला भी झुलाया, कहा माखन चोर शाम ।। कभी राघव

मुझे पहचान तू अरे ओ मनुज,
मै हूँ तेरे ही अंदर, तू है मेरा अनुज
जड चेतन सबका मै ही हूं एक धाम ।। कभी राघव


3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    सभी पाठकों को चर्चा मंच परिवार की ओर से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज बुधवार (28-08-2013) को रूपया छा-सठ में फँसा, उन-सठ से हैरान: चर्चा मंच 3051 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ---सही कहा आशा जी वह मन के अन्दर ही है... तभी तो सभी के मन की भावना व तरंग पर विविध रूप धरलेता है....जड़ भी, जंगम भी और चित्त चुराने वाला चेतन रूप भी....

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