मित्रों!

आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।


समर्थक

रविवार, 4 अगस्त 2013

कलम की खुशबू

बहुत समय बाद कुछ लिखना चाहा 

तो कलम की जगह अपना मोबाइल उठाया

ज़िन्दगी की खिटपिट और मोबाइल की पिट पिट से तंग
बस कुछ शब्द ही जोड़ पाया

भौतिकता में उलझी ज़िन्दगी पे खुद से कई सवाल किए
और अपने ही सवालों के आगे खुद को निरुत्तर पाया

मन ढूँढ रहा था कलम की खुशबू 
और कोस रहा था मन ही मन तकनीक को भी

झुँझलाकर मैंने तैयारी कर ली सोने की
मोबाइल को लगाया साइलेंट मोड पर

पर ये मन लगा रहा अपने उधेड़बुन में
कि आखिर कलम की वो खुशबू कहाँ गयी ?

5 टिप्‍पणियां:

  1. तकनीकी युग के कुछ ऐसे प्रभाव भी होते हैं
    बेहद सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. अच्छी उधेड़-बुन है.....

    कलम की खुशबू मौजूद है, मुलाहिजा किया जाए
    अंधी दौड़ में समय की कमी को न कोसा जाए
    लिखने के लिए कलम का ही प्रयोग हो श्याम -
    तकनीक का प्रयोग सिर्फ तकनीकी में किया जाए

    उत्तर देंहटाएं
  3. कलम की खुश्बू ,विवेक भी गायब है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर है। ॐ शान्ति।

    कलम की खुश्बू ,विवेक दोनों गायब है।

    भाषा वर्तनी खाने लगी है

    मोबाइल की नै वर्तनी -

    व्याकरण भुलाने लगी है।

    शेक्स्पीयर की आत्मा चिल्लाने लगी।

    अंग्रेजी-

    अब हिंगलिश से भी आगे जाने लगी है

    उत्तर देंहटाएं