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शनिवार, 31 अगस्त 2013

श्रीमदभागवत गीता चौदहवाँ अध्याय (श्लोक १ - ५ )

श्रीमदभागवत गीता चौदहवाँ अध्याय (श्लोक १ - ५ )

(१ )भगवान् बोले -समस्त ज्ञानों में उत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर से कहूंगा ,जिसे जानकार सब साधकों ने इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि प्राप्त की है। 

The Lord said :

I shall impart you another knowledge which is the best of all kinds of Higher knowledge ,acquainted with which the sages have attained the highest perfection transcending this world .

(2 )इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप को प्राप्त मनुष्य सृष्टि के आदि में पुनर्जन्म नहीं लेते तथा प्रलय काल में भी व्यथित नहीं होते। 

Those who recourse to this knowledge ,attain similitude with Me and are not born even at the time of creation nor destructed at the time of dissolution .

( ३ )हे अर्जुन। मेरी महद्ब्रह्म  रूप प्रकृति सभी प्राणियों की योनि  है ,जिसमें मैं चेतन रूप बीज डालकर (जड़ और चेतन के संयोग से )समस्त भूतों (शरीरधारियों )की उत्पत्ति करता हूँ। 

माया द्वारा उत्पन्न प्रकृति महद्ब्रह्म  का स्रोत है ,मूल है ,बुनियाद है। अत :प्रकृति को महद्ब्रह्म भी कहा गया है। महद्ब्रह्म के कई नाम हैं ,यथा महत ,महतत्त्व ,परमबुद्धि और वैश्विक मनस। जब प्रकृति में पुरुष का बीज अंकुरित होने के लिए बोया जाता है ,तब प्रकृति सृष्टि की रचना करती है। 
अध्यात्म में पुरुष का एक अर्थ आत्मा भी बतलाया गया है प्रकृति एक अर्थ शरीर भी कहा गया है. 

O!Arjuna !The Prakriti (The MahatBrahman ) from which the universe is born is in my possession .In it I cast the seed of 'living -multitude '.The origin of all the embodied beings emanate from the association of these two .  

(४ )हे कुंती पुत्र ,सभी योनियों में जितने शरीर पैदा होते हैं ,प्रकृति उन सबकी माता है और मैं चेतना देने वाला पिता हूँ। 

O Arjuna !Among all the species of beings whatever living forms originate ,the Prakriti is the cause and I am the seed -bestowing progenitor .

(५ )हे अर्जुन प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणरुपी  रस्सी -सत्व ,रजस और तमस -अविनाशी जीव को देह के साथ बाँध देते हैं। 

O Arjuna !The Sattva ,Rajas ,and Tamas are the gunas inherent of Prakriti .They fasten the immutable self in the body .

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