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बुधवार, 14 अगस्त 2013

ऐ कलम छेड़ दो अब नव तराने.......गीत....डा श्याम गुप्त....



                              

                                


ऐ कलम  ! अब छेड़ दो तुम नव तराने ,

पीर दिल की दर्द के नव आशियाने |  

आसमानों  की नहीं है चाह मुझको ,

मैं चला हूँ बस जमीं के गीत गाने ||


आज क्यों हर ओर छाई हैं घटाएं ,

चल रहीं हर ओर क्यों ये आंधियां |

स्वार्थ लिप्सा दंभ की धूमिल हवा में ,

लुप्त  मानवता  हुई है  कहाँ जाने  ||

 

तुम करो तो याद कुछ दायित्व अपना ,

तुम करो पूरा सभी दायित्व अपना |

तुम लिखो हर बात मानव के हितों की,

क्या मिलेगा भला प्रतिफल, राम जाने ||

 

तुम  मनीषी और  परिभू  स्वयंभू  हो  ,

तोड़ कारा  सभी वर्गों की,  गुटों की |

चल पड़ो स्वच्छंद नूतन काव्य पथ पर,

राष्ट्र हित उत्थान के लिखदो तराने ||

 

हर तरफ समृद्धि-सुख की ही धूम है,

नव-प्रगति, नव साधनों की धूप फ़ैली |

चाँद-तारों  पर  जा पहुंचा  आदमी है,

रक्त-रंजित धरा फिर भी क्यों, न जाने ?


व्यष्टि सुख में ही जूझता हर आदमी,

हित समष्टि न सोच पाता आदमी अब | 

देश के अभिमान, जग सम्मान के हित,,

देश  के  उत्थान   के लिख दो  तराने ||


राष्ट्र-हित सम्मान के लिख दो तराने,

आज नव-उत्थान के लिख दो तराने |

तुम लिखो तो बात मानव के हितों की,

फल व प्रतिफल,तुम न सोचो, राम जाने ||


मैं चला हूँ   इस जमीं के  गीत गाने|

पीर  दिल  की  दर्द के  नव आशियाने |

ऐ कलम ! अब छेड़ दो तुम नव तराने || 

 

 

 हमारी सच्ची  आज़ादी तब होगी 
      जब हमारा प्यारा भारत
भ्रष्टाचार, अनैतिकता से मुक्त होगा

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक आज बृहस्पतिवार (15-08-2013) को "जाग उठो हिन्दुस्तानी" (चर्चा मंच-अंकः1238) पर भी होगा!
    स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बेहद का मौजू गीत तिरंगे के रंग लिए। जीवन का वृत्तांत लिए आज के स्वार्थी आदमी के।

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  3. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 16.08.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  4. धन्यवाद शास्त्रीजी, ब्रिजेश जी , वीरेन्द्र जी एवं आशा जी....

    उत्तर देंहटाएं